जो मनुष्य सबको समानता से देखता है और दुख के संदर्भ में समान भाव रखता है, गीता में उसे परम श्रेष्ठ योगी कहा गया है। मन की समवृत्ति होना मनुष्य का अंतिम लक्ष्य है। प्राय: हम अपने संबंधियों के विषय में पक्षपात करते हैं और दूसरे लोगों के मामले में तिरस्कार का भाव रखते हैं, परंतु समदर्शी व्यक्ति सदैव निष्पक्ष होता है।
रामानुज धाम आश्रम के अधिष्ठाता अनन्तश्री विभूषित स्वामी देवनायकाचार्य समदर्शी महाराज ने श्रद्धालुओं को श्रीमद्भागवत गीता के ज्ञान अमृत से परिचित कराते हुए कहा कि श्रीमद्भागवत गीता जीवात्मा का परमात्मा से परिचय कराती हैं।
आत्मा अविनाशी है और शरीर नाशवान है, आत्मा किसी काल में न तो जन्म लेती है न मरती है। शरीर के नष्ट हो जाने के बाद भी यह नहीं मारी जाती। व्यक्ति सांसारिक सुखों के वशीभूत होकर परमात्मा से विमुख हो जाता है। श्रीमद भागवतगीता जीवात्मा का परमात्मा से साक्षात्कार कराती है।
दतिया जिला मुख्यालय से 5 किमी दूरी पर ग्वालियर हाइवे पर स्थित श्री रामानुज धाम आश्रम देश भर में श्री मद भगवतगीता के प्रचार प्रसार का प्रमुख केंद्र हैं।
आश्रम की स्थापना के समय से ही यहां श्रीमद्भागवत गीता का अखंड अनवरत पाठ जारी हैं। श्री ऋषि कृष्ण शास्त्री ने दिव्य दरबार लगाकर सुनी अर्जीयां-
बुधवार को श्रीरामानुज धाम आश्रम पर श्री पचघरा धाम वरियन सरकार मंदिर के पीठाधीश्वर श्री श्री 1008 श्री ऋषि कृष्ण शास्त्री जी का आगमन हुआ। उन्होंने स्वामी देवनायकाचार्य जी महाराज के दर्शन कर आशीर्वाद प्राप्त किया तथा आश्रम पर बिराजित देवी देवताओं के दर्शन किए।
इस अवसर पर उन्होंने दिव्य दरबार लगाकर श्रीरामानुज धाम आश्रम पर उपस्थित लोगों की अर्जियां सुनी तथा समस्या निदान के लिए उपाय बताए। प्रमुख रूप से डॉ मयंक ढेंगुला, देवराज खद्दर, पांडेय जी, ध्रुव गुप्ता, आत्माराम दुबे, मुरली शर्मा, उपाध्याय, मैथलीशरण दांगी, मनोज शर्मा, पत्रकार सतीश सिहारे, शैलेंद्र सिंह बुंदेला, पार्षद ब्रजेश दुबे आदि उपस्थित रहे।
ज्ञानविज्ञानतृप्तात्मा कूटस्थो विजितेन्द्रिय: ।
युक्त इत्युच्यते योगी समलोष्ट्राश्मकाञ्चन: ॥ ८ ॥
संंतजनो के अनुसार वह व्यक्ति आत्म-साक्षात्कार को प्राप्त तथा योगी कहलाता है जो अपने अर्जित ज्ञान तथा अनुभूति से पूर्णतया सन्तुष्ट रहता है। ऐसा व्यक्ति अध्यात्म को प्राप्त तथा जितेन्द्रिय कहलाता है। वह सभी वस्तुओं को—चाहे वे कंकड़ हों, पत्थर हों या कि सोना—एकसमान देखता है।
परम सत्य की अनुभूति के बिना कोरा ज्ञान व्यर्थ होता है। भक्तिरसामृत सिन्धु में (१.२.२३४) कहा गया है—
अत: श्रीकृष्णनामादि न भवेद् ग्राह्यमिन्द्रियै:।
सेवोन्मुखे हि जिह्वादौ स्वयमेव स्फुरत्यद: ॥
“कोई भी व्यक्ति अपनी दूषित इन्द्रियों के द्वारा श्रीकृष्ण के नाम, रूप, गुण तथा उनकी लीलाओं की दिव्य प्रकृति को नहीं समझ सकता। भगवान् की दिव्य सेवा से पूरित होने पर ही कोई उनके दिव्य नाम, रूप, गुण तथा लीलाओं को समझ सकता है।”
यह भगवद्गीता कृष्णभावनामृत का विज्ञान है। मात्र संसारी विद्वत्ता से कोई कृष्णभावनाभावित नहीं हो सकता। उसे विशुद्ध चेतना वाले व्यक्ति का सान्निध्य प्राप्त होने का सौभाग्य मिलना चाहिए। कृष्णभावनाभावित व्यक्ति को भगवत्कृपा से ज्ञान की अनुभूति होती है, क्योंकि वह विशुद्ध भक्ति से तुष्ट रहता है। अनुभूत ज्ञान से वह पूर्ण बनता है। आध्यात्मिक ज्ञान से मनुष्य अपने संकल्पों में दृढ़ रह सकता है, किन्तु मात्र शैक्षिक ज्ञान से वह बाह्य विरोधाभासों द्वारा मोहित और भ्रमित होता रहता है। केवल अनुभवी आत्मा ही आत्मसंयमी होता है, क्योंकि वह कृष्ण की शरण में जा चुका होता है। वह दिव्य होता है क्योंकि उसे संसारी विद्वत्ता से कुछ लेना-देना नहीं रहता। उसके लिए संसारी विद्वत्ता तथा मनोधर्म, जो अन्यों के लिए स्वर्ण के समान उत्तम होते हैं, कंकड़ों या पत्थरों से अधिक नहीं होते।
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