भाग:133) सकल जलचर थलचर नभचर प्रलय एवं विनाश के तत्पश्चात सृजन भी संभव है
टेकचंद्र सनोडिया शास्त्री: सह-संपादक की रिपोर्ट,9822550220
परम्, भूयः, प्रवक्ष्यामि, ज्ञानानाम्, ज्ञानम्, उत्तमम्,
यत्, ज्ञात्वा, मुनयः, सर्वे, पराम्, सिद्धिम्, इतः, गताः।।1।।
अनुवाद:(ज्ञानानाम्) ज्ञानोंमें भी (उत्तमम् तत्) अति उत्तम उस (परम्) अन्य परम (ज्ञानम्) ज्ञानको मैं (भूयः) फिर (प्रवक्ष्यामि) कहूँगा, (यत्) जिसको (ज्ञात्वा) जानकर (सर्वे) सब (मुनयः) मुनिजन (इतः) इस संसारसे मुक्त होकर (पराम्) परम (सिद्धिम्) सिद्धिको (गताः) प्राप्त हो गये हैं अर्थात् पूर्ण परमात्मा को प्राप्त हो गए हैं। (1)
हिन्दी: ज्ञानोंमें भी अति उत्तम उस अन्य परम ज्ञानको मैं फिर कहूँगा, जिसको जानकर सब मुनिजन इस संसारसे मुक्त होकर परम सिद्धिको प्राप्त हो गये हैं अर्थात् पूर्ण परमात्मा को प्राप्त हो गए हैं।
इदम्, ज्ञानम्, उपाश्रित्य, मम, साधम्र्यम्, आगताः,
सर्गे, अपि, न, उपजायन्ते, प्रलये, न, व्यथन्ति, च।।2।।
अनुवाद: (इदम्) इस (ज्ञानम्) ज्ञानको (उपाश्रित्य) आश्रय करके अर्थात् धारण करके (मम) मेरे (साधम्र्यम्) जैसे गुणों को (आगताः) प्राप्त हुए साधक (सर्गे) सृृष्टिके आदिमें (न उपजायन्ते) उत्पन्न नहीं होते (च) और (प्रलये) प्रलयकालमें (अपि) भी (न व्यथन्ति) व्याकुल नहीं होते। (2)
हिन्दी: इस ज्ञानको आश्रय करके अर्थात् धारण करके मेरे जैसे गुणों को प्राप्त हुए साधक सृृष्टिके आदिमें उत्पन्न नहीं होते और प्रलयकालमें भी व्याकुल नहीं होते।
अध्याय 14 का श्लोक 3
मम, योनिः, महत्, ब्रह्म, तस्मिन्, गर्भम्, दधामि, अहम्,
सम्भवः, सर्वभूतानाम्, ततः, भवति, भारत।।3।।
अनुवाद: (भारत) हे अर्जुन! (मम) मेरी (महत्) मूल प्रकृति अर्थात् दुर्गा तो सम्पूर्ण प्राणियोंकी (योनिः) योनि है अर्थात् गर्भाधानका स्थान है और (अहम् ब्रह्म) मैं ब्रह्म-काल (तस्मिन्) उस योनिमें (गर्भम्) गर्भको (दधामि) स्थापन करता हूँ (ततः) उस संयोगसे (सर्वभूतानाम्) सब प्राणियों की (सम्भवः) उत्पत्ति (भवति) होती है। (3)
हिन्दी: हे अर्जुन! मेरी मूल प्रकृति अर्थात् दुर्गा तो सम्पूर्ण प्राणियोंकी योनि है अर्थात् गर्भाधानका स्थान है और मैं ब्रह्म-काल उस योनिमें गर्भको स्थापन करता हूँ उस संयोगसे सब प्राणियों की उत्पत्ति होती है।
अध्याय 14 का श्लोक 4
सर्वयोनिषु, कौन्तेय, मूर्तयः, सम्भवन्ति, याः,
तासाम्, ब्रह्म, महत्, योनिः, अहम्, बीजप्रदः, पिता।।4।।
अनुवाद: (कौन्तेय) हे अर्जुन! (सर्वयोनिषु) सब योनियोंमें (याः) जितनी (मूर्तयः) मूर्तियाँ अर्थात् शरीरधारी प्राणी (सम्भवन्ति) यजुर्वेद अध्याय 40 मन्त्र 10 उत्पन्न होते हैं, (महत्) मूल प्रकृृति तो (तासाम्) उन सबकी (योनिः) गर्भ धारण करनेवाली माता है और (अहम् ब्रह्म) मैं (बीजप्रदः) बीजको स्थापन करनेवाला (पिता) पिता हूँ। (4)
हिन्दी: हे अर्जुन! सब योनियोंमें जितनी मूर्तियाँ अर्थात् शरीरधारी प्राणी यजुर्वेद अध्याय 40 मन्त्र 10 उत्पन्न होते हैं, मूल प्रकृति तो उन सबकी गर्भ धारण करनेवाली माता है और मैं बीजको स्थापन करनेवाला पिता हूँ।
अध्याय 14 का श्लोक 5
सत्त्वम्, रजः, तमः, इति, गुणाः, प्रकृृतिसम्भवाः,
निबध्नन्ति, महाबाहो, देहे, देहिनम्, अव्ययम्।।5।।
अनुवाद: (महाबाहो) हे अर्जुन! (सत्त्वम्) सत्त्वगुण, (रजः) रजोगुण और (तमः) तमोगुण (इति) ये (प्रकृतिसम्भवाः) प्रकृतिसे उत्पन्न (गुणाः) तीनों गुण (अव्ययम्) अविनाशी (देहिनम्) जीवात्माको (देहे) शरीरमें (निबध्नन्ति) बाँधते हैं। (5)
हिन्दी: हे अर्जुन! सत्त्वगुण, रजोगुण और तमोगुण ये प्रकृतिसे उत्पन्न तीनों गुण अविनाशी जीवात्माको शरीरमें बाँधते हैं।
अध्याय 14 का श्लोक 6
तत्र, सत्त्वम्, निर्मलत्वात्, प्रकाशकम्, अनामयम्,
सुखसंगेन, बध्नाति, ज्ञानसंगेन, च, अनघ।।6।।
अनुवाद: (अनघ) हे निष्पाप! (तत्र) उन तीनों गुणोंमें (सत्त्वम्) सत्वगुण तो (निर्मलत्वात्) निर्मल होनेके कारण (प्रकाशकम्) प्रकाश करनेवाला और (अनामयम्) नकली अनामी है वह (सुखसंगेन) सुखके सम्बन्धसे (च) और (ज्ञानसंगेन) ज्ञानके सम्बन्धसे अर्थात् उसके अभिमानसे (बध्नाति) बाँधता है। (6)
हिन्दी: हे निष्पाप! उन तीनों गुणोंमें सत्वगुण तो निर्मल होनेके कारण प्रकाश करनेवाला और नकली अनामी है वह सुखके सम्बन्धसे और ज्ञानके सम्बन्धसे अर्थात् उसके अभिमानसे बाँधता है।
अध्याय 14 का श्लोक 7
रजः, रागात्मकम्, विद्धि, तृष्णासंगसमुद्भवम्,
तत्, निबध्नाति, कौन्तेय, कर्मसंगेन, देहिनम्।।7।।
अनुवाद: (कौन्तेय) हे अर्जुन! (रागात्मकम्) रागरूप (रजः) रजोगुणको (तृष्णासंगसमुद्भवम्) कामना और आसक्तिसे उत्पन्न (विद्धि) जान (तत्) वह (देहिनम्) इस जीवात्माको (कर्मसंगेन) कर्मोंके और उनके फलके सम्बन्धसे (निबध्नाति) बाँधता है। (7)
हिन्दी: हे अर्जुन! रागरूप रजोगुणको कामना और आसक्तिसे उत्पन्न जान वह इस जीवात्माको कर्मोंके और उनके फलके सम्बन्धसे बाँधता है।
अध्याय 14 का श्लोक 8
तमः, तु, अज्ञानजम्, विद्धि, मोहनम्, सर्वदेहिनाम्,
प्रमादालस्यनिद्राभिः, तत्, निबध्नाति, भारत।।8।।
अनुवाद: (भारत) हे अर्जुन! (सर्वदेहिनाम्) सब शरीरधारियोंको (मोहनम्) मोहित करनेवाले (तमः) तमोगुणको (तु) तो (अज्ञानजम्) अज्ञानसे उत्पन्न (विद्धि) जान। (तत्) वह इस जीवात्माको (प्रमादालस्यनिद्राभिः) प्रमाद आलस्य और निंद्राके द्वारा (निबध्नाति) बाँधता है। (8)
हिन्दी: हे अर्जुन! सब शरीरधारियोंको मोहित करनेवाले तमोगुणको तो अज्ञानसे उत्पन्न जान। वह इस जीवात्माको प्रमाद आलस्य और निंद्राके द्वारा बाँधता है।
अध्याय 14 का श्लोक 9
सत्त्वम्, सुखे, संजयति, रजः, कर्मणि, भारत,
ज्ञानम्, आवृत्य, तु, तमः, प्रमादे, संजयति, उत।। 9।।
अनुवाद : (भारत) हे अर्जुन! (सत्त्वम्) सत्वगुण (सुखे) सुखमें (संजयति) लगाता है और (रजः) रजोगुण (कर्मणि) कर्ममें तथा (तमः) तमोगुण (तु) तो (ज्ञानम्) ज्ञानको (आवृृत्य) ढककर (प्रमादे) प्रमादमें (उत) भी (संजयति) लगाता है। (9)
हिन्दी: हे अर्जुन! सत्वगुण सुखमें लगाता है और रजोगुण कर्ममें तथा तमोगुण तो ज्ञानको ढककर प्रमादमें भी लगाता है।
अध्याय 14 का श्लोक 10
रजः, तमः, च, अभिभूय, सत्त्वम्, भवति, भारत,
रजः, सत्त्वम्, तमः, च, एव, तमः, सत्त्वम्, रजः, तथा।।10।।
अनुवाद: (भारत) हे अर्जुन! (रजः) रजोगुण (च) और (तमः) तमोगुणको (अभिभूय) दबाकर (सत्त्वम्) सत्वगुण, (सत्त्वम्) सत्वगुण (च) और (तमः) तमोगुणको दबाकर (रजः) रजोगुण (तथा) वैसे (एव) ही (सत्त्वम्) सत्वगुण और (रजः) रजोगुणको दबाकर (तमः) तमोगुण (भवति) होता है अर्थात् बढ़ता है। (10)
हिन्दी: हे अर्जुन! रजोगुण और तमोगुणको दबाकर सत्वगुण, सत्वगुण और तमोगुणको दबाकर रजोगुण वैसे ही सत्वगुण और रजोगुणको दबाकर तमोगुण होता है अर्थात् बढ़ता है
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