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(भाग:211) हरि अनंत हरि कथा अनंता:अर्थात प्रभु श्रीराम की कथा भवसागर को पार करने वाली

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(भाग:211) हरि अनंत हरि कथा अनंता:अर्थात प्रभु श्रीराम की कथा भवसागर को पार करने वाली है।

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टेकचंद्र सनोडिया शास्त्री: सह-संपादक रिपोर्ट

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रामचंद्र के चरित सुहाए, कलप कोटि लगि जाहि न गाए.। ऐसे कई भावपूर्ण भजनों से गुरूवार को गूंज रहा था हेरहंज प्रखंड। अवसर था श्रीहनुमंत प्राण प्रतिष्ठा व श्रीलक्ष्मीनारायण महायज्ञ के तीसरे दिन गुरूवार को यज्ञशाला में पूजन का। महायज्ञ में तीसरे दिन का शुभारंभ योगासन और ध्यान के विशेष सत्र के साथ किया गया। इसके बाद पूजन कार्य पूर्ण कर संतों ने प्रवचनों के माध्यम से उपस्थित भक्तों का मार्गदर्शन किया। इस मौके पर महायज्ञ आयोजन समिति के अध्यक्ष संतोष यादव, रंजीत जायसवाल, रूपेंद्र जायसवाल, विजय शंकर, छोटू जायसवाल, मनु गुप्ता, नितेश जायसवाल, पीकू गुप्ता, संदीप साहू व मुरली प्रसाद समेत कई लोग मौजूद थे।

हमारा धर्म आतंकी नहीं बनाता हम प्रेम के प्रचारक : सुनीता

श्रीहनुमंत प्राण प्रतिष्ठा व श्रीलक्ष्मीनारायण महायज्ञ के तीसरे दिन गुरूवार को वाराणसी से आई मानस माधुरी सुनीता ने प्रवचन करते हुए कहा कि हमारे समाज में दो तरह के प्राणी होते हैं। एक भटके हुए और एक सजग। सजग आदमी भटके हुए से प्रेरणा लेकर ज्ञान हासिल कर सकता है, लेकिन भटका हुआ व्यक्ति सजग व्यक्ति के जीवन से प्रेरणा नहीं ले पाता। लिहाजा सजग लोगों को इन भटके हुए लोगों को सही मार्ग पर लाने की जरूरत है। पूरे विश्व में इस समय भटके हुए लोगों का बोलबाला है जोकि इस मानव सभ्यता के दुश्मन बन रहे हैं। भारतीय सोच के अनुसार जब हम मुझमें राम, तुझमें राम, सब में राम का अनुसरण करेंगे तो इससे सामाजिक समानता आएगी। भारतीय चितन के इस विधा को उपनिषद कहता है कि जो अपनी आत्मा सब में देखता है और सब में अपनी आत्मा को देखता है, वह किसी से ईष्र्या नहीं करता। उन्होंने कहा कि विश्व में जितने भी धर्म हैं वह सभी हमारे धर्म ग्रंथों से प्रेरित हैं लेकिन दुर्भाग्य है कि वह अपने आप को सर्वश्रेष्ठ बताने में लगे हुए हैं। जबकि हमारी भारतीय सोच विश्व का उद्धार कर सकती है, आप सभी को इस भारतीय चितन का प्रचार करना होगा। क्योंकि हमारा धर्म आतंकी नहीं बनाता हम प्रेम के प्रचारक हैं। सबका सम्मान और सबके कल्याण हेतु ईश्वर की अराधना करना ही हमारा मूल कर्तव्य है।

श्रीराम को मर्यादा पुरुषोत्तम राम भी कहा जाता है। पुराणों में लिखा है कि श्री राम के रूप में भगवान विष्णु ने ही धरती पर अवतार लिया था ताकि संतजनों पर बढ़ रहे राक्षसी अत्याचार को खत्म किया जा सके।

भगवान राम का जन्म चैत्र शुक्ल नवमी को गुरु पुष्य नक्षत्र , कर्क लग्न में अयोध्या के राजा दशरथ के घर हुआ। दशरथ की पहली पत्नी कौशल्या के पुत्र के रूप में राम जन्में और समस्त ऋषि मुनियों के जीवन में राक्षसी अत्याचारों का अंत हुआ।

सवाल उठता है कि दूसरे राजाओं के राजकुमार की तरह श्री राम का जन्म हुआ लेकिन वो मर्यादा पुरुषोत्तम राम कैसे बने। कैसे वो मानव जाति के लिए असत्य पर विजय पाने वाले विजयी पुरुष बने।

तुलसीदास जी ने लिखा है कि जब पृथ्वी पर रावण का अत्याचार बढ़ा और धर्म की हानि होने लगी तब भगवान शिव कहते हैं कि –

राम जनम के हेतु अनेका । परम विचित्र एक तें एका ।।
जब जब होई धरम की हानि । बाढ़हिं असुर अधम अभिमानी ।।
तब तब प्रभु धरि विविध सरीरा। हरहिं कृपानिधि सज्जन पीरा ।।

अर्थात असुरों के नाश हेतु और धर्म की रक्षा के लिए प्रभु तरह तरह के शरीरों में जन्म लेकर सज्जनों की पीड़ा हरते हैं।

श्री राम की जन्म कुंडली बताती है कि श्री राम की कुंडली में उच्च ग्रहों का अप्रत्याशित योग ही उन्हें मर्यादा पुरुषोत्तम राम बनाता है। दरअसल राम को विष्णु के सातवें अवतार के रूप में जाना जाता है। इस अवतार में विष्णु ने सामान्य मानस की तरह व्यवहार किया और समाज में रहे। बिना किसी चमत्कारिक शक्ति के, राम ने एक आम इंसान की तरह जिंदगी व्यतीत की और सामान्य जन मानस के लिए नए उदाहरण स्थापित किए।

देखा जाए तो राम ने किसी भी लीक को नहीं तोड़ा। वो एक आदर्श व्यक्ति के तौर पर समाज के हर वर्ग और व्यक्ति के साथ खड़े दिखे।

भरत और शत्रुघ्न के लिए आदर्श भाई के रूप में श्री राम दिखे। पिता के लिए आदर्श बेटा बनकर राम ने नई सुकीर्ति गढ़ जिसके तहत कहा गया कि प्राण जाए पर वचन न जाए। पिता की बात को रखने के लिए राम ने वनगमन तक किया और अनेक दुख सहे और नए समाज को भी इससे प्रेरणा मिली।

प्रजा के लिए राम सदैव नीति कुशल राजा के तौर पर दिखे। जनता की रक्षा करनी हो या नए समाज की परिकल्पना राम ने सदैव उच्च विचारों से प्रेरित होकर न्याय प्रिय राजा के जैसा व्यवहार किया। तभी तो राजतिलक से पहले ही जब राम को वनवास का आदेश मिला तो पूरी अयोध्या नगरी एक साथ रो पड़ी।

लक्ष्मण के लिए भावनात्मक भाई

लक्ष्मण सदैव राम के लिए चहेते भाई की तरह रहे। वो जब मेघनाद के वार से अचेत हुए तो सबसे पहले राम ही घबराकर रुदन करने लगे थे। तब एक व्याकुल और अधीर भाई की छवि राम के भीतर दिखाई दी जिसे लौटकर पिता और भाई की पत्नी को जवाब देना था।

सुग्रीव के परम मित्र

सुग्रीव के लिए राम एक परम मित्र की तरह दिखे। सुग्रीव के हित के लिए राम ने छल करने में भी आनाकानी नहीं की। सुग्रीव और बाली के युद्ध के समय राम ने छल से बाली का वध किया। हालांकि बाद में पुराणों ने इस घटनाक्रम की अपने अलग तरीके से व्याख्या कर इसे उचित ठहराया लेकिन एक आम इंसान के तौर पर राम ने छल ही किया जिसका उद्देश्य अपने दोस्त की रक्षा करना था।

विभीषण के लिए परम सहायक

राम जानते थे कि विभीषण हर अवस्था में उनका साथ देंगे। लेकिन इसके लिए राम ने प्रतीक्षा की। रावण की मृत्यु का भेद जानकर रावण का वध करके राम चाहते तो लंका पर भी राज कर सकते थे लेकिन उन्होंने दोस्ती और सहायता का सही प्रतिउत्तर दिया और विभीषण को लंका का राज सौंप कर लौट आए।

एक बेहतर विद्यार्थी

श्री राम ने ही उदाहरण स्थापित किए कि कोई व्यक्ति हमेशा संपूर्ण ज्ञानी नहीं हो सकता। उन्होंने कई मौकों पर शिक्षा देने वाले शिक्षको का सम्मान किया। जब रावण की मृत्यु हुई तो श्रीराम उसके चरणों की तरफ बैठे और रावण से ज्ञान लिया। उन्होंने लक्ष्मण से भी यही कहा कि जब ज्ञानी ज्ञान दे तो उसे शिरोधार्य जरूर करना चाहिए।

जात पात के खिलाफ उदाहरण

शबरी के झूठे बेरों को श्रीराम ने उतनी ही लगन और चाव से खाया जितने चाव से शबरी ने बेर दिए थे। श्रीराम ने इस संदर्भ में जात पात और वर्गभेद के विरुद्ध उदाहरण पेश किया

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