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(भाग:285) भक्तजनों के लिए करुणा के सागर है भगवान देवाधिदेव महादेव की जय हो

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भाग:285) भक्तजनों के लिए करुणा के सागर है भगवान देवाधिदेव महादेव की जय हो

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टेकचंद्र सनोडिया शास्त्री: सह-संपादक रिपोर्ट

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भगवान शिव करुणा के सागर हैं। वे अपने भक्त पर जितनी जल्दी करुणा बरसाते हैं उतनी जल्दी कोई देवता प्रसन्न नहीं होता। भगवान शिव को प्रसन्न करना बेहद आसान है। वे तो महज एक लोटा जल से ही प्रसन्न हो जाते हैं। भगवान शिव के अनेकों नाम है जिसमें एक नाम आशुतोष भी कहा गया है, अर्थात शीघ्र प्रसन्न होने वाले देव। ये विचार फरीदकोट के रोज एनक्लेव स्थित महामृत्युंजय महादेव मंदिर में आयोजित प्रवचन कार्यक्रम के दौरान स्वामी कमलानंद गिरिने व्यक्त किए।

 

उन्होंने कहा कि गीता में 700 श्लोक हैं जबकि शिव महापुराण में 24 हजार श्लोक वर्णित हैं। शिव महापुराण में प्रत्येक श्लोक का अर्थ भिन्न है। शिव क्रोधावतार नहीं बल्कि करुणावतार हैं। शिव की पूजा देवता तो करते ही हैं, दानव भी शिव के परम भक्त हैं। सच्चे मन से शिव महिमा सुनने व उनका ध्यान करने वाला भक्त सदैव सुखों को पाता है। देवों के देव होने के चलते भगवान शिव महादेव भी कहलाते हैं।

 

स्वामी जी ने कहा कि अक्सर देखा जाता है कि मंदिर में जाकर भी भक्त का ध्यान कहीं और ही होता है। मंदिर में बैठने का उसके पास बिल्कुल समय नहीं होता। बस आता है और आनन-फानन में माथा टेककर चला जाता है। मंदिर में जाओ तो कुछ देर वहां बैठो और प्रभु का ध्यान लगाओ। स्वामी जी ने कहा कि मनुष्य के मन में पलने वाली तृष्णा उसकी चिता का मूल कारण है। तृष्णा मनुष्य के संतोष को समाप्त कर देती है। संतोष समाप्त होने पर पैदा होने वाला असंतोष मानसिक तनाव का कारण बनता है। इसलिए मनुष्य को तृष्णा नहीं बढ़ानी चाहिए क्योंकि तृष्णा की पूर्ति कभी भी नहीं होती।

 

स्वामी जी ने कहा कि मन में ही स्वर्ग होता है और मन में ही नरक। व्यक्ति खुद ही घर-परिवार को स्वर्ग बनाता है और खुद ही नरक। व्यक्ति के स्वभाव को बदलना बड़ा कठिन है। मनुष्य की भावना पर सब कुछ निर्भर रहता है। महाराज जी ने कहा कि मनुष्य जैसे कर्म करेगा उसका वैसा ही फल मिलेगा। अर्थात जैसे बीज बोओगे वैसा फल पाओगे।

 

मनुष्य की हर सोच उसके जीवन के खेत में बोया गया एक बीज ही है। यदि मनुष्य अच्छी सोच के बीज बोएगा तो अच्छा फल मिलेगा। अगर बुरी सोच के बीच बोएगा तो बबूल ही मिलेगा। भविष्य को स्वर्णमयी बनाने के लिए उन बीजों का ध्यान देना होगा जो आज बो रहे हैं। प्रेम के बीज बोएंगे तो प्रेम के ही फल अंकुरित होकर आएंगे। क्रोध और गाली-गलौच के बीच बोएंगे तो खुद के लिए विषैले तथा व्यंग भरे वातावरण का निर्माण होगा। मनुष्य की सोच जैसी होगी उसके विचार भी वैसे बन जाएंगे।

 

स्वामी जी ने श्रद्धालुओं को नित्य प्रतिदिन भगवान सूर्य नारायण को अ‌र्घ्य देने की बात पर जोर देते हुए कहा कि भगवान सूर्यदेव को अ‌र्घ्य देने से तेज बढ़ता है। जो भक्त रोजाना सूर्यदेव को अ‌र्घ्य देते हैं, उनकी आंखों की रोशनी भी तेज रहती है। ऐसे साधक को कभी ऐनकें नहीं लगानी पड़ती। रोजाना सुबह सबसे पहले सूर्य देव व तुलसी को जल जरूर चढ़ाएं। जहां सूर्य देव को अ‌र्घ्य देने से आंखों की रोशनी बढ़ती है, वहीं तुलसी के पत्ते का सेवन करने से शरीर निरोग रहता है।

वैदिक देवताओं में देवादिदेव महादेव शिव के महत्वपूर्ण पद के अधिकारी हैं। वैदिक रुद्र की तुलना पौराणिक कथाओं में शिव से अधिक महिमामंडित के रूप में होती है, जहां एक ओर उनके आध्यात्मिक या आलौकिक रूप का पूर्ण विस्तार और स्पष्टता से प्रवेश किया गया है, वहीं उनकी सती के साथ संबंध, दक्षयज्ञ विध्वंस, पार्वतीवल्लभ, कैलासवासी, नागभूषण, चंद्रमौली गजाधर, नीलकंठ और कार्तिकेय तथा गणेश के जनक आदि परिवार के रूप में भी उल्लेखनीय हैं। तात्त्विक दृष्टि से ये दोनों एक हैं, सिद्धांत है तथापि दोनों सिद्धांतों का परिचय ही महादेव शिव के दर्शन के लिए है।

 

देवादिदेव महादेव शिव में मेरा अपना कुछ नहीं है। देवादिदेव के संबंध में रामायण, महाभारत और पुराणों से संबंधित सामग्री का अर्थ मुझे बुद्धिगामी और हृदय में हुआ, उसी की पूर्ण निष्ठा और परिश्रम से प्रस्तुतिकरण प्रस्तुत पुस्तक है।

 

शिवत का इतिवृत्त बहुत व्यापक है, विस्तृत है, विविध है, गूढ़ भी है और रहस्यमय भी है। विविध आख्यानो, के साथ उनके चार सहस्रनाम, शतनाम, अष्टदशतनाम नामावली, स्तुतिया, स्तोत्र, कवच आदि भी पुराणों में यात्रा तत्र उपलब्ध है। उन सभी को दोस्त बनाया गया है। विविध कल्पो में अज शिव विभिन्न अभिधानों से अवतरित होते हैं, उनकी भी एडजस्ट पुस्तक में हुआ है। शिव ही एक मात्र देव हैं, अन्य भी देवता ही पूज्य हैं, अन्य स्वय शिव हैं। द्वादश ज्योतिर्लिङो के विशद परिचय के साथ उज्जयिनी के चौरासी लियॉ, काशी के अनेक लियॉ तथा अन्य प्रमुख लिओ की नामावली का सग्रह भी पुस्तक उपलब्ध है।

 

शिव को अज्ञात पाया जाता है तो उनका शिवलोक, उनके गण आदि प्रकाश पर भी कब्जा कर लिया जाता है। एक्टर्स में उनका भी परिचय प्रस्तुत किया गया है

सर्गश्च प्रतिसर्गश्च वंशो मन्वन्तराणि च।

वंशानुचरित चैव पुराण पंचलक्षणम्।।

 

पुराणों के प्रतिपाद्य के सच्च घ मे पुराणों में जहा सृष्टि एवं प्रलय के उपरान्त पुन: हैं। सृष्टि आदि विषयों के अतिरिक्त मानस, ऋषियों, पौधो प्रभृति की वंशावली के साथ देवों के विवरण को भी एक सामान्य विषय वस्तु के रूप में स्वीकार किया गया है, जहां अन्यत्र शैव पुराण, वैष्णव पुराण, ब्रह्म पुराण आदि प्रमुख पुराणों के प्रमुख वर्ण्य विषय देवों को ही माना जाता है। गया है. अति. यह स्पष्ट होता है कि देव, देवियों का वर्णन पुराणों का एक अत्यंत महत्वपूर्ण विषय है और इन्हीं पुराणों में पंचदेव पूजा को महत्वपूर्ण रूप से प्राप्त किया गया है। इसी कारण आज से पांच वर्ष पूर्व आपके हाथों में मैंने पार्वती (पुराणों के सन्दर्भ में) कहा था और आज प्रस्तुत है देवादिदेव महादेव शिव (पुराणों के सन्दर्भ में)। मेरी महादेव शिव विषयक प्रस्तुति योजना के विषय में जानने के लिए परिमल प्रकाशन के संस्थापक, आज गोलोकवासी दा0 के0 एल0 जोशी जी ने अपना रोग शय्या से ही शिव कहा है। विष्णु, कृष्ण आदि विषय पर एक संपूर्ण श्रंखला प्रस्तुत करने के लिए मुझे टेलीफोन के माध्यम से ही प्रेरित और उत्साहित किया गया था। अन्य विविध फिल्मों में स्वय को मेरे बीच उलझाया गया है आज श्रंखला की पहली कड़ी ही आपके हाथ तीन रही हूं।

 

देवादिदेव महादेव शिव में मेरा अपना कुछ नहीं है। देवादिदेव के संबंध में रामायण, महाभारत और पुराणों से संबंधित सामग्री का अर्थ मुझे बुद्धिगामी और हृदयदुगम हुआ, उसी का पूर्ण निष्ठा और परिश्रम से प्रस्तुतिकरण प्रस्तुत पुस्तक है। पुराणों में शिव के दो रूप पाए जाते हैं पहला उनका आध्यात्मिक या सैद्धान्तिक रूप और दूसरा उनका परिवार और देववृन्द के अधीश्वर का रूप। अज, अनादि के अनुसार आध्यात्मिक वर्णन। अनंत शिव का सहायक अज्ञेय है अत. वे स्वयंभू हैं। सर्वत्र व्याप्ति शिव दिग्वास है। सत्व, रज तथा तम रूपी शूल को धारण करने वाले वे शूली हैं तो काम क्रोधित मद लोभ आदि रूपी सर्पों के आभूषण वे शूली हैं। वे घोर हैं वही रुद्र कहलते हैं, अघोर हैं अत वे शिव हैं। वे प्राण हैं, अपान हैं तो वे ही काल हैं, मृत्यु हैं। सोम्यनिसन्दि चन्द्र से शोभित वेचन्द्रमौली हैं तो हलाहल विष को कंठ में धारण कर विश्व की रक्षा करने वाले वे नीलकंठ हैं। समस्त देवों में महनीय हैं। महान् विषय के अधिकारी हैं, महत् विश्व के पालक हैं अत. महेश्वर हैं, महादेव हैं। वे ही प्रणवरूप ॐ हैं, निर्गुण ब्रह्म हैं।

 

उनका दूसरा रूप है, लीलापुरुष शिव का जो नाना रूप में धारण कर विविध संवेदनाओं को व्यक्त करते हैं। सती के दग्धा होने पर जहां दक्ष यज्ञ का विनाश होता है वहीं प्रेमार्द्र चित्त से सती के अर्धदग्ध देह कोधे पर्वत पर वियोगी कण्ठ शिव यात्रा तत्र सर्वत्र पर्यटन करते हैं। परिणामसति पृष्णों की स्थापना होती है। लीलाधर वे ही कालान्तर में नाना छल करके मेना और हिमालय को छकाते हैं तो पार्वती पुष्प को विभिन्न लीलाओं को रूपायित करते हैं, कार्तिकेय के जनन बनाते हैं तो गणेश के साथ-साथ दिव्य युद्ध करने के ऊपर अनंत गजानन भगवान गणेश को देवताओं की अग्रपूज्य वे ही तोड़ते हैं। ।।

 

देवादिदेव वे विष्णु के रूप में प्रकट होते हैं, उनके मुख से सहस्रनाम कहलावते हैं। उनका एक नेत्र कमल के दर्शन होते हैं तो स्वयं विष्णु के दर्शन होते हैं, उनका ध्यान होता है। महादेव शिव ब्रह्मा के गौरवित सिर का छेदन करके ब्रह्महत्या से प्रकट होते हैं तो स्वयं ब्रह्मापुत्र भगवान रुद्र रूप में प्रकट होते हैं। रावण को दस सिरो का वर दिया जाता है तो द्रौपदी को पंचपति का वर भी वे ही देते हैं।

 

शिव का इतिवृत्त बहुत व्यापक है, विस्तृत है। विविध है, भगवान भी है और रहस्यमय भी है। विविध आख्यानों, उपाख्यानों के साथ उनके चार सहस्रनाम शतनाम अष्टेत्तरशतनाम, नामावली, स्तुतिया, स्तोत्र, कवच आदि भी पुराणों में यात्रा तत्र उपलब्ध हैं। उन सभी को दोस्त बनाया गया है। विभिन्न कल्पों में अज शिव विभिन्न अभिधानों से अवतरित होते हैं, उनका भी समायोजन पुस्तक में हुआ है। शिव ही एक मात्र देवं हैं, अन्य स्वयं शिव हैं। द्वादश ज्योतिर्लिंगों के विशद परिचय के साथ उज्जयिनी के चौरासी लिगों, काशी के अनेक लाइक तथा अन्य प्रमुख लिको की नामावली का संग्रह भी पुस्तक में उपलब्ध है।

 

शिव को अज्ञात पाया जाता है तो उनका शिवलोक, उनके गण आदि प्रकाश पर भी कब्जा कर लिया जाता है। एक्टर्स में उनका भी परिचय प्रस्तुत किया गया है। मेरे सभी विकलांगों और प्राणियों से मेरी संपूर्ण निष्ठा और परिश्रम का परिणाम है देवादिदेव महादेव शिव (पुराणों के सन्दर्भ में)। यदि मेरा यह साधन स्वयं आलोकित महादेव, महेश्वर शिव के महान व्यक्तित्व को स्वल्प मात्रा में भी पहचाने जैसा करवाता है तो मैं समझूंगा कि मेरी निष्ठा फलीभूत हुई, मेरा परिश्रम सार्थक हुआ।

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