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(भाग:317) देव-दानव के अथक परिश्रम से समुद्र मंथन से उत्पन्न हुई कामधेनु गाय की मंहिमा

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(भाग:317) देव-दानव के अथक परिश्रम से समुद्र मंथन से उत्पन्न हुई कामधेनु गाय की मंहिमा

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टेकचंद्र सनोडिया शास्त्री: सह-संपादक रिपोर्ट

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​समुद्र मंथन से हुई थी कामधेनु गाय की उत्पत्ति​

कामधेनु गाय की उत्पत्ति की बात करें, तो देवताओं और दानवों के बीच जब समुद्र मंथन हुआ था, तो समुद्र में से 14 रत्न निकले थे, जिनमें से कामधेनु गाय भी एक थी। देवता और दानव दोनों ही कामधेनु गाय को पाना चाहते थे, क्योंकि कामधेनु गाय सभी की मनोकामनाएं पूरी करने वाली गाय थीं।

हिन्दू धर्म में हमेशा से ही ‘गाय’ को एक पवित्र पशु माना गया है, ना केवल एक जीव, वरन् हिन्दू मान्यताओं ने गाय को ‘मां’ की उपाधि दी है। गाय को मनुष्य का पालनहार माना गया और इससे मिलने वाले दूध को अमृत के समान माना जाता है। लेकिन यह मान्यता कुछ महीनों, वर्षों या दशकों की नहीं…

 

युगों से ही गाय को पूजनीय माना गया है। यदि आप हिन्दू धर्म को समझते हैं या फिर हिन्दू मान्यताओं की जानकारी रखते हैं तो शायद आपने कामधेनु गाय के बारे में भी सुना होगा। हिन्दू धर्म के अनेक धार्मिक ग्रंथों में कामधेनु गाय का जिक्र किया गया है। कहते हैं कामधेनु गाय में दैवीय शक्तियां थीं, जिसके बल पर वह अपने भक्तों की हर मनोकामना पूरी करती थी।

कामधेनु

यह गाय जिसके भी पास होती थी उसे हर तरह से चमत्कारिक लाभ होता था। लेकिन इस गाय के दर्शन मात्र से भी मनुष्य के हर कार्य सफल हो जाते थे। दैवीय शक्तियां प्राप्त कर चुकी कामधेनु गाय का दूध भी अमृत एवं चमत्कारी शक्तियों से भरपूर माना जाता था।

यह गाय जिसके भी पास होती थी उसे हर तरह से चमत्कारिक लाभ होता था। लेकिन इस गाय के दर्शन मात्र से भी मनुष्य के हर कार्य सफल हो जाते थे। दैवीय शक्तियां प्राप्त कर चुकी कामधेनु गाय का दूध भी अमृत एवं चमत्कारी शक्तियों से भरपूर माना जाता था।

इसके चमत्कारी गुण

यही कारण है कि कामधेनु गाय को मात्र एक पश मानने की बजाय ‘माता’ की उपाधि दी गई थी। एक ऐसी मां जो अपने बच्चों की हर इच्छा पूर्ण करती है, उन्हें पेट भरने के लिए आहार देती है और उनका पालान-पोषण करती है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि कामधेनु गाय की उत्पत्ति कहां से हुई?

पौराणिक कथा

एक पौराणिक कथा के अनुसार समुद्र मंथन के समय देवता और दैत्यों को समुद्र में से कई वस्तुएं प्राप्त हुईं। जैसे कि मूल्यवान रत्न, अप्सराएं, शंख, पवित्र वृक्ष, चंद्रमा, पवित्र अमृत, कुछ अन्य देवी-देवता और हलाहल नामक अत्यंत घातक विष भी। इसी समुद्र मंथन के दौरान क्षीर सागर में से कामधेनु गाय की उत्पत्ति भी हुई थी।

 

समुद्र मंथन

 

पुराणों में कामधेनु गाय को नंदा, सुनंदा, सुरभी, सुशीला और सुमन भी कहा गया है। कामधेनु गाय से संबंधित पुराणों में कई सारी कथाएं प्रचलित हैं… कृष्ण कथा में अंकित सभी पात्र किसी न किसी कारणवश शापग्रस्त होकर जन्में थे। कश्यप ने वरुण से कामधेनु मांगी थी, लेकिन बाद में लौटाई नहीं। अत: वरुण के शाप से वे ग्वाले हुए।

 

भगवान परशुराम

कामधेनु गाय से संबंधित एक और कथा विष्णु के मानवरूपी अवतार भगवान परशुराम से जुड़ी है जिसके अनुसार एक बार सहस्त्रार्जुन अपनी पूरी सेना के साथ जंगलों को पार करता हुआ जमदग्नि ऋषि (भगवान परशुराम के पिता) के आश्रम में विश्राम करने के लिए पहुंचा।

 

जमदग्नि ऋषि

महर्षि ने राजा को अपने आश्रम का मेहमान समझकर स्वागत सत्कार किया और उन्हें आसरा दिया। उन्होंने सहस्त्रार्जुन की सेवा में किसी भी प्रकार की कोई कसर नहीं छोड़ी। यह तब की बात है जब ऋषि जमदग्रि के पास देवराज इन्द्र से प्राप्त दिव्य गुणों वाली कामधेनु नामक अद्भुत गाय थी।

 

दैवीय गुणों वाली कामधेनु

राजा नहीं जानते थे कि यह गाय कोई साधारण पशु नहीं, वरन् दैवीय गुणों वाली कामधेनु गाय है, लेकिन कुछ समय के पश्चात जब राजा ने गाय के चमत्कार देखे तो वे दंग रह गए। महर्षि का आश्रम काफी साधारण था, ना अधिक सुविधाएं थीं और ना ही काम में हाथ बंटाने लायक कोई सेवक।

राजा ने देखे चमत्कार

लेकिन महर्षि ने कामधेनु गाय की मदद से कुछ ही पलों में देखते ही देखते राजा और उनकी पूरी सेना के लिए भोजन का प्रबंध कर दिया। कामधेनु के ऐसे विलक्षण गुणों को देखकर सहस्त्रार्जुन को ऋषि के आगे अपना राजसी सुख कम लगने लगा।

 

ऋषि से मांगी कामधेनु

अब उनके मन में महर्षि के प्रति ईर्ष्या उत्पन्न होने लगी और साथ ही वे महर्षि से उस गाय को ले जाने की तरकीब भी बनाने लगे। लेकिन सबसे पहले राजा ने सीधे ही ऋषि जमदग्नि से कामधेनु को मांगा। किंतु जब ऋषि जमदग्नि ने कामधेनु को आश्रम के प्रबंधन और जीवन के भरण-पोषण का एकमात्र जरिया बताकर उसे देने से इंकार कर दिया, तो राजा ने बुराई का मार्ग चुनना सही समझा।

 

जबरन ले ली

राजा ने क्रोधित होकर ऋषि जमदग्नि के आश्रम को उजाड़ दिया, सब तहस-नहस हो गया। लेकिन यह सब करने के बाद जैसे ही राजा सहस्त्रार्जुन अपने साथ कामधेनु को ले जाने लगा तो तभी वह गाय उसके हाथों से छूट कर स्वर्ग की ओर चली गई। और आखिरकार दुष्ट राजा को वह गाय नसीब नहीं हुई, लेकिन वहीं दूसरी ओर महर्षि जमदग्नि दोहरे नुकसान को झेल रहे थे।

 

स्वर्ग की ओर चली गई कामधेनु

एक ओर वे अपनी कामधेनु गाय को खो चुके थे और दूसरी ओर आश्रम भी ना रहा। कुछ समय के पश्चात महर्षि के पुत्र भगवान परशुराम आश्रम लौटे और जब उन्होंने यह दृश्य देखा तो हैरान रह गए। इस हालात का कारण पूछने पर उनकी माता रेणुका ने उन्हें सारी बातें विस्तारपूर्वक बताई।

परशुराम हुए क्रोधित

परशुराम माता-पिता के अपमान और आश्रम को तहस नहस देखकर आवेश में आ गए। पराक्रमी परशुराम ने उसी वक्त दुराचारी सहस्त्रार्जुन और उसकी सेना का नाश करने का संकल्प लिया। परशुराम अपने परशु अस्त्र को साथ लेकर सहस्त्रार्जुन के नगर महिष्मतिपुरी पहुंचे।

 

पिता के अपमान का बदला

यहां पहुंचने पर राजा सहस्त्रार्जुन और उनके बीच भीषण युद्ध हुआ। किंतु परशुराम के प्रचण्ड बल के आगे सहस्त्रार्जुन बौना साबित हुआ। भगवान परशुराम ने दुष्ट सहस्त्रार्जुन की हजारों भुजाएं और धड़, परशु से काटकर कर उसका वध कर दिया।

 

फिर गए तीर्थ

कहते हैं सहस्त्रार्जुन के वध के बाद जैसे ही परशुराम अपने पिता के पास वापस आश्रम पहुंचे तो उनके पिता ने उन्हें आदेश दिया के वे इस वध का प्रायश्चित करने के लिए तीर्थ यात्रा पर जाएं, तभी उनके ऊपर से राजा की हत्या का पाप खत्म होगा। लेकिन ना जाने कहां से परशुराम के तीर्थ पर जाने की खबर सहस्त्रार्जुन के पुत्रों को मिल गई।

ऐरावत हाथी के समान ही कामधेनु गाय की उत्पत्ति भी समुद्र मंथन से हुई. पौराणिक कथाओं के अनुसार समुद्र मंथन के समय देवों और असुरों को 14 रत्न, अप्सराएं, अमृत और विष की प्राप्ति हुई. क्षीरसागर से प्राप्त 14 रत्नों में एक रत्न कामधेनु गाय भी थी. इसी तथ्य से हम जान सकते हैं कि कामधेनु गाय का भारतीय संस्कृति में कितना महत्व है. पुराणों के अनुसार कामधेनु गाय में समस्त देवताओं का वास है. इसे नंदा, सुनंदा, सुराधी के नामों से भी जाना जाता है. कामधेनु को सभी गायों की मूल माता माना गया है और इसके हर अंग में चमत्कारी शक्तियां हैं. कहते हैं कामधेनु गाय जिस भी व्यक्ति को प्राप्त हो जाए वो दुनिया की सभी सम्पदाओं का मालिक बन जाता है. कामधेनु गाय ऐसी माता है जो संपूर्ण सृष्टी का पालन पोषण करती है और सबका पेट भरने के लिए आहार देती है.

कामधेनु गाय के बारे में कई और पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं. इनके अनुसार चाहे देवता हो या दानव कामधेनु गाय को हर कोई पाना चाहता था क्यूंकि कामधेनु जिस किसी के पास होती थी वो सबसे शक्तिशाली बन जाता था. कहते हैं कामधेनु गाय सबसे पहले ऋषि वशिष्ठ के पास थी उनसे इसको पाने के लिए कई लोगों ने युद्ध किया. एक बार विश्वामित्र भी इसको पाने के लिए वशिष्ठ के आश्रम में पहुंच गए किन्तु उन्हें भी वहां से हारकर वापस आना पड़ा.

 

एक और कथा के अनुसार कामधेनु गाय ऋषि जमदग्नि के पास थी. ऋषि जमदग्नि परशुराम के पिता थे. ऋषि जमदग्नि को भगवान इंद्र ने कुछ समय के लिए कामधेनु गाय दी थी. एक समय राजा सहस्त्रार्जुन जम्दागिन के आश्रम आए. आश्रम में ऋषि द्वारा राजा सहस्त्रार्जुन का अच्छे से स्वागत-सत्कार किया गया. सहस्त्रार्जुन ने जब ये देखा कि आश्रम में कोई ख़ास सुख-सुविधा के न होते हुए भी उनका स्वागत इतनी भव्यता से किया गया है तो वो बड़े हैरान हुए. तभी राजा की नज़र आश्रम में स्थित कामधेनु गाय पर पड़ी तो उन्हें तुरंत समझ आ गया कि ये सब इस चमत्कारी गाय के प्रभाव से ही संभव हो पाया है. तब उन्होंने ऋषि जम्दागिन से कामधेनु को उन्हें देने के लिए कहा और जब ऋषि ने मना किया तो उन्होंने इस गाय को पाने के लिए उनके आश्रम पर आक्रमण कर उसे ध्वस्त कर दिया. आश्रम को ध्वस्त करने के बाद सहस्त्रार्जुन ने बल का प्रयोग करते हुए कामधेनु को अपने साथ ले जाने का प्रयास किया. लेकिन तभी कामधेनु राजा के हाथों से छूटकर स्वर्ग चली गई. और इस प्रकार सहस्त्रार्जुन को खाली हाथ लौटना पड़ा. जब परशुराम ने अपने पिता के आश्रम की ऐसी अवस्था देखी तो क्रोध में आकर उन्होंने राजा सहस्त्रार्जुन के देश जाकर उनका वध कर दिया.

 

कामधेनु गाय में 33 देवी देवताओं का वास माना जाता है. इनमें 12 आदित्य, 8 वसु, 11 रुद्र और 2 अश्विन कुमार देवी-देवता हैं. इस प्रकार कामधेनु के अंग-अंग में सुख-समृद्धि और शक्ति का वास है. ऐसा माना जाता है कि केवल कामधेनु की उपासना से सभी देवी-देवता प्रसन्न हो जाते हैं. इस प्रकार कामधेनु गाय अपनी दैवीय शक्तियों के बल पर भक्तों की हर मनोकामना पूरी करती है.

 

भारतीय वास्तुशास्त्र में भी कामधेनु गाय का विशेष महत्व है. कहते हैं घर में एक विशेष स्थान पर कामधेनु की उनके बछड़े नंदिनी के साथ प्रतिमा रखी जाए तो उस घर के सभी जनों को आध्यात्मिक और भौतिक सफलता प्राप्त होती है. क्यूंकि कामधेनु घर में सौभाग्य, समृद्धि और खुशहाली लाती है. इसके अलावा काफी लोग कामधेनु की प्रतिमा को अपने कार्यस्थल में भी स्थापित करते हैं. माना जाता है कामधेनु गाय कार्य स्थल में सफलता प्राप्त करने के लिए सबसे अनुकूल होती है.

 

कामधेनु गाय को ब्रहमांडीय गाय माना जाता है और यह पोषण, शान्ति और समृद्धि का प्रतीक है. कहते हैं आज की दुनिया के सभी मवेशी कामधेनु के वंशज हैं.

 

कामधेनु गाय के शरीर के हर अंग का एक धार्मिक प्रतीक है। इसके चार पैर चार वेदों के प्रतीक हैं, और इसके स्तन चार पुरुषार्थों के प्रतीक हैं। इसके सींग देवताओं के प्रतीक हैं, इसका चेहरा सूर्य और चंद्रमा का प्रतीक है, इसके कंधे अग्नि के प्रतीक हैं।

कामधेनु गाय की तरह हिंदू धर्म में हमेशा से ही हर गाय को एक पवित्र पशु माना गया है. भारतीय संस्कृति में युगों से ये माना जाता रहा है कि जिस घर में गाय निवास करती है और जहाँ उनकी सेवा की जाती है वहां कोई भी समस्या अपने पाँव नहीं पसारती. आज भी भारत के सभी गाँव कस्बों में जब किसी की रसोई में खाना बनता है तो हमेशा पहली रोटी गाय के लिए निकाली जाती है. गाय को ना केवल एक जीव बल्कि हिंदू मान्यताओं में मां की उपाधि दी गई है. ऐसी भी मान्यता है कि 84 लाख योनियों में जन्म लेने के बाद हमारी आत्मा अंतिम योनि में गाय बनती है. गाय को मनुष्य का पालनहार माना गया है और इससे मिलने वाले दूध को अमृत के समान माना जाता है. भगवान कृष्ण से जुड़ी कथाओं में भी गाय अपना विशेष स्थान रखती है. इस प्रकार भारत में गाय का महत्व बहुत अधिक है और इसकी रक्षा और संरक्षण की जिम्मेदारी हम सभी की बनती है.

कामधेनु गाय की तरह हिंदू धर्म में हमेशा से ही हर गाय को एक पवित्र पशु माना गया है. भारतीय संस्कृति में युगों से ये माना जाता रहा है कि जिस घर में गाय निवास करती है और जहाँ उनकी सेवा की जाती है वहां कोई भी समस्या अपने पाँव नहीं पसारती. आज भी भारत के सभी गाँव कस्बों में जब किसी की रसोई में खाना बनता है तो हमेशा पहली रोटी गाय के लिए निकाली जाती है. गाय को ना केवल एक जीव बल्कि हिंदू मान्यताओं में मां की उपाधि दी गई है. ऐसी भी मान्यता है कि 84 लाख योनियों में जन्म लेने के बाद हमारी आत्मा अंतिम योनि में गाय बनती है. गाय को मनुष्य का पालनहार माना गया है और इससे मिलने वाले दूध को अमृत के समान माना जाता है. भगवान कृष्ण से जुड़ी कथाओं में भी गाय अपना विशेष स्थान रखती है. इस प्रकार भारत में गाय का महत्व बहुत अधिक है और इसकी रक्षा और संरक्षण की जिम्मेदारी हम सभी की बनती है

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