ईश्वरीय सम्पति का दुरुपयोग के वजाय सदुपयोग कीजिए?अन्यथा बेडा गर्क
टेकचंद्र सनोडिया शास्त्री: सह-संपादक रिपोर्ट
प्रयागराज। नागा साधु मनोज पुरी ने कहा कि ईश्वर की दी हुई कुछ न कुछ विशेष संपत्ति सबके पास होती है। किसी के पास धन है, किसी के पास बल है, किसी के पास विद्या है, किसी के पास कोई और कला है।”तो किसी के पास राज्य सत्ता का सुख प्राप्त है. इन सभी ईश्वर से प्राप्त सुख सुविधाओं का दुरुपयोग के बजाय सदुपयोग करना चाहिए ? अन्यथा बेडा गर्क होने में देर नहीं लगेगी?
उन्होंने बताया कि ये सारी संपत्तियां ईश्वर की कृपा से और ईश्वर की न्याय व्यवस्था से मिलती हैं।” परंतु जो लोग गंभीरता से विचार करना नहीं जानते, वे अविद्या में फंसकर ऐसा सोचते हैं, कि “ये सारी विद्याएं कलाएं शक्तियां धन बल बुद्धि शरीर आदि संपत्तियां हमारे ही द्वारा उत्पन्न की हुई हैं। हम ही इनके मालिक हैं। और हम ही अपनी इन संपत्तियों के इकलौते उपभोक्ता हैं।” इस प्रकार का मिथ्याज्ञान और अभिमान प्रायः लोगों को होता है। “ऐसा सोचना ऐसा मानना और ऐसा मानकर व्यवहार करना अनुचित और अत्यंत हानिकारक है।”
क्योंकि विद्वानों तथा गुरुजनों ने बताया है, कि “जब व्यक्ति में अभिमान आ जाता है, तो उसकी बुद्धि नष्ट हो जाती है। जब किसी की बुद्धि नष्ट हो जाती है, तो उसका सर्वनाश हो जाता है।” इसलिए ऐसी अविद्या या भ्रांति से बचना चाहिए। और वास्तविकता को समझना चाहिए। वास्तविकता यही है, कि “जो भी आपके पास धन बल विद्या बुद्धि शरीर आदि संपत्तियां हैं, ये सब ईश्वर द्वारा दी गई हैं।”
यह ठीक है, कि “आपने भी कुछ अच्छे कर्म किए हैं, जिनके फलस्वरूप ईश्वर ने आपको ये सब संपत्तियां दी हैं।” “परंतु इन संपत्तियों की उत्पत्ति में आपका इतना योगदान नहीं है, जितना ईश्वर की कृपा का है। और इसके अतिरिक्त आपके माता-पिता गुरुजन संसार के अन्य विद्वान पड़ोसी मित्र इत्यादि तथा और भी बहुत से कारण हैं, जिनकी सहायता से आपको ये सारी योग्यताएं कलाएं प्राप्त हुई हैं।”
“इस सत्य को यदि आप स्वीकार कर लेंगे, तो कभी आपको अभिमान नहीं आएगा। आपकी बुद्धि ठीक काम करेगी, और आप सबके साथ उचित न्याय पूर्वक व्यवहार करेंगे।” “इसका बहुत अच्छा फल यह होगा कि जब आप सबके साथ न्यायपूर्वक उत्तम व्यवहार करेंगे, तो ईश्वर आपको आगे भी सब प्रकार से सुख शांति उन्नति और समृद्धि प्रदान करेगा। अन्यथा पशु पक्षी वृक्ष आदि योनियों में भयंकर दंड देगा।”
“इसलिए अविद्या और अभिमान से बचें। सत्य को पहचानें। सबके साथ न्यायपूर्वक उचित व्यवहार करें, और आनंद से जीते हुए अपने जीवन को सफल बनाएं।”
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