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भारत समेत एशिया में सबसे तेज़ एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस महामारी का खतरा

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भारत समेत एशिया में सबसे तेज़ एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस महामारी का खतरा

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टेकचंद्र शास्त्री: सह-संपादक रिपोर्ट,9822550220,

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नई दिल्ली, विवेक तिवारी। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने एंटीबायोटिक रजिस्टेंस सर्विलेंस रिपोर्ट 2025 जारी की है। इस रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि सामान्य संक्रमण और नियमित तौर पर किए जाने वाले इलाज के लिए एंटीबायोटिक प्रतिरोध एक बड़ी चुनौती बन सकता है। रिपोर्ट के मुताबिक, 2023 में दुनियाभर में किए गए अध्ययन में सामने आया है कि हर छह में से एक बैक्टीरियल संक्रमण के मामले में एंटीबायोटिक दवा काम नहीं कर रही है। इन दवाओं के प्रति प्रतिरोध पैदा हो गया है। एंटीबायोटिक दवाओं के प्रतिरोध का खतरा लगातार बढ़ रहा है। अध्ययन में पाया गया कि भारत सहित दक्षिण-पूर्व एशिया और पूर्वी भूमध्यसागरीय क्षेत्रों में एंटीबायोटिक दवाओं की प्रतिरोध दर सबसे ज्यादा देखी गई। रिपोर्ट के मुताबिक एंटीबायोटिक दवाओं के बिना डॉक्टर की सलाह के या अपने आप से मेडिकल स्टोर से दवा लेकर खाने से इन दवाओं का प्रतिरोध मरीजों में बढ़ रहा है। वहीं अगर एम्स भोपाल के एक अध्ययन के मुताबिक ई. कोलाई बैक्टीरिया के इलाज में इस्तेमाल होने वाली एंटीबायोटिक दवा सिप्रोफ्लोक्सासिन की सफलता की दर मात्र 39 फीसदी रह गई है। इसका मतलब ये है कि हर दस में से छह रोगियो में इस एंटीबायोटिक दवा के इलाज से फायदा नहीं मिलता है। वहीं सांस और खून में इंफेक्शन के लिए जिम्मेदार क्लेबसिएला न्यूमोनिया के संक्रमण के इलाज में एंटीबायोटिक मेरोपेनम की प्रभावशीलता मात्र 52% रह गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले दिनों में बहुत सी एंटीबायोटिक दवाओं के बेअसर होने से बीमारियों का इलाज भी मुश्किल होगा। वहीं इन दवाओं के काम न करने से एक तरफ जहां महामारी का खतरा बढ़ेगा वहीं सामान्य बीमारियों का इलाज भी बेहद महंगा हो जाएगा।

विश्व स्वास्थ्य संगठन ने दुनिया भर में 104 देशों से 23 मिलियन से अधिक बैक्टीरिया के संक्रमण और उसके इलाज के आंकड़े जुटाए हैं। इसके आधार पर ये अध्ययन किया गया है। ये स्टडी साफ तौर पर दर्शाती है कि कई सामान्य बैक्टीरियल संक्रमण के इलाज में अब पहले जैसी एंटीबायोटिक दवाएं प्रभावी नहीं रह गई हैं। इंडियन मेडिकल एसोसिएशन के एंटीमाक्रोबियल रजिस्टेंस स्टैंडिंग कमेटी के अध्यक्ष डॉक्टर नरेंद्र सैनी कहते हैं कि भारत में एंटीबायोटिक्स के प्रति रजिस्टेंस बहुत ज्यादा है। अगर डब्लूएचओ की रिपोर्ट में दुनिया में छह में से एक रजिस्टेंस का मामला है तो कोई बड़ी बात नहीं कि भारत में छह में से दो एंटीबायोटिक रजिस्टेंस के मामले सामने आएं। हमें इस बात को समझना होगा कि बीमारियां दो तरह की होती हैं एक जिनमें बैक्टीरियल संक्रमण होता है और दूसरी जिनमें बैक्टीरियल संक्रमण नहीं होता है। आजकल ज्यादातर लाइफस्टाइल वाली बीमारियां सामने आती हैं। इन बीमारियों के इलाज में किसी भी तरह के एंटीबायोटिक की जरूरत नहीं पड़ती है। यहां तक की ज्यादातर जुकाम, बुखार और खांसी के मामले भी वायरल इंफेक्शन के कारण होते हैं। इनके इलाज में एंटीबायोटिक काम नहीं करती है। ऐसे में एंटीबायोटिक का इस्तेमाल तब ही किया जाना चाहिए जब डॉक्टर आपको इसके इस्तेमाल की सलाह दे।

एंटीबायोटिक दवाओं के विकास में बहुत लम्बा समय लगता है। आखिरी एंटीबायोटिक दवा 1983 में विकसित की गई थी। इसका नाम डेप्टोमाइसिन था। ये दवा बाजार में 2003 में आ सकी। इन दवाओं के विकास और इनकी टेस्टिंग में काफी समय लगता है। रिसर्च की बढ़ती लागत और लम्बे समय के चलते दवा कंपनियों ने भी नई एंटीबायोटिक दवाओं की रिसर्च का काम लगभग बंद कर रखा है। ऐसे में दुनियाभर में सरकारों को इन दवाओं के रिसर्च में निवेश करना चाहिए। यदि एंटीबायोटिक दवाओं का संकट ऐसे ही बढ़ता रहा तो किसी एक महामारी से बड़ी संख्या में लोगों की मौत होगी और इसे संभाल पाना बेहद मुश्किल हो जाएगा।

सैनी कहते हैं कि, हमें ये भी समझना होगा कि सिर्फ एंटीबायोटिक दवाएं खाने से ही रजिस्टेंस पैदा नहीं हो रहा। मुर्गियों को भी एंटीबायोटिक दवाएं दी जाती हैं ताकि वो बीमार न हों और इससे उनका वजन भी बढ़ता है। लेकिन इन मुर्गियों को खाने वाले के शरीर में अपने आप ये दवाएं चली जाती हैं। वहीं बीमारियों से बचाव के लिए पौधों में भी इस तरह की दवाएं डाली जाती हैं। कई बार पानी में भी ये एंटीबायोटिक्स पाए जाते हैं।

डब्लूएचओ की ओर से मुख्य रूप से आठ जीवाणु रोगजनकों पर एंटीबायोटिक के प्रभाव पर अध्ययन किया। इनमें एसिनेटोबैक्टर प्रजाति, एस्चेरिचिया कोलाई, क्लेबसिएला न्यूमोनिया, निसेरिया गोनोरिया, गैर-टाइफाइडल साल्मोनेला प्रजाति, शिगेला प्रजाति, स्टैफिलोकोकस ऑरियस और स्ट्रेप्टोकोकस न्यूमोनिया शामिल हैं। इन संक्रमण पर इलाज में इस्तेमाल होने वाली प्रमुख 22 एंटीबायोटिक दवाओं के प्रति इन बैक्टीरिया की प्रतिरोधक क्षमता का अनुमान लगाया गया। ये बैक्टीरिया प्रमुख रूप से रक्तप्रवाह, पेट में संक्रमण, यूरिनरी ट्रैक और गोनोरिया के लिए जिम्मेदार हैं।

माइक्रोबायोलॉजिस्ट एवं एएमआर मामलों की विशेषज्ञ डॉक्टर प्राप्ति गिलाडा कहती हैं कि, भारत में एंटी बैक्टीरियल रजिस्टेंस काफी बढ़ चुका है। बहुत से अस्पतालों में आईसीयू में लम्बे समय तक रहने वाले मरीजों में ऐसे बैक्टीरियल इंफेक्शन जिन्हें पहले आसानी से कंट्रोल कर लिया जाता था अब उन्हें नियंत्रित करने के लिए दवाओं की कमी पड़ रही है। नियमित तौर पर इस्तेमाल किए जाने वाली बहुत सी एंटीबायोटिक दवाओं का असर कम हो रहा है। बैक्टीरिया में इनके प्रति रजिस्टेंस पैदा हो चुका हैं। भारत में एंटीबायोटिक्स दवाओं का बिना सोचा समझा इस्तेमाल मुश्किल बढ़ा रहा है। बहुत से लोग पहले हुई बीमारी के आधार पर एंटीबायोटिक का इस्तेमाल करने लगते हैं। या बहुत से मरीज ठीक महसूस करने पर दवाओं का पूरा कोर्स नहीं करते हैं। कई बार देखा गया है कि जुकाम, खांसी जैसी स्थिति में भी लोग सीधे दुकान से जा कर एंटीबायोटिक दवाएं ले लेते हैं। ये बेहद गंभीर है। इन्हीं वजहों से देश में इन दवाओं के प्रति रजिस्टेंस तेजी से विकसित हो रहा है। किसी मरीज को अगर यूरिनरी ट्रैक्ट में इंफेक्शन है या कफ है तो बिना सैंपल की जांच कराए एंटीबायोटिक का इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए। एक व्यक्ति के जीवन में एंटीबायोटिक दवाओं का इस्तेमाल एक निश्चित मात्रा में ही हो सकता है। ऐसे में अगर इन दवाओं का बेवजह इस्तेमाल होगा तो कभी मुश्किल स्थिति में ये दवाएं काम नहीं करेंगी।

एम्स ट्रामा सेंटर के डाक्टरों की शोध में यह बात सामने आई है कि यदि कल्चर जांच के आधार पर मरीजों को एंटीबायोटिक दवा दी जाए तो दवा की जरूरत कम होगी। इससे इलाज में एंटीबायोटिक दवाओं के बेअसर होने की समस्या भी कम होगी। एम्स के डाक्टरों ने ट्रामा सेंटर के आईसीयू में भर्ती हुए 18 वर्ष से अधिक उम्र के 582 मरीजों पर अध्ययन किया है। इन मरीजों को आईसीयू में भर्ती करने के 24 घंटे के अंदर अनुभव के आधार पर दी गई एंटीबायोटिक, एंटी फंगल दवाओं और कल्चर जांच के इस्तेमाल पर तुलनात्मक अध्ययन किया। इस अध्ययन में पाया गया कि बगैर यह जाने की मरीज को किस चीज का संक्रमण था, सिर्फ अनुभव के आधार पर एंटीबायोटिक व एंटी फंगल दवा देने पर उसकी खपत अधिक हुई। कल्चर जांच से संक्रमण का पता चलने के बाद एंटीबायोटिक दवाएं बदलनी भी पड़ीं। दवा भी कम मरीजों को देने की जरूरत पड़ी। एम्स ट्रामा सेंटर के माइक्रो बायोलाजी विभाग की प्रोफेसर डा. पूर्वा माथुर ने कहा कि आईसीएमआर की शोध परियोजना के तहत यह अध्ययन किया था। इसका मकसद आईसीयू में एंटीबायोटिक की खपत का पैटर्न जानना था ताकि इनका इस्तेमाल कम करने की नीति बनाई जा सके।

एंटीबायोटिक रजिस्टेंस की समस्या तब पैदा होती है जब एंटीबायोटिक का गलत या जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल होता है। इसके चलते ‘सुपरबग्स’ यानी ऐसे बैक्टीरिया पैदा हो जाती हैं जिन पर आम दवाएं असर नहीं करतीं। इससे मरीजों को अस्पताल में ज्यादा दिन भर्ती रहना पड़ता है। इससे इलाज भी अधिक जटिल व महंगा हो जाता है। आम दवाओं से ठीक होने वाले मामलों की तुलना में ऐसे मामलों का इलाज लगभग दोगुना महंगा पड़ता है। थिंक टैंक सेंटर फॉर ग्लोबल डेवलपमेंट के इस अध्ययन में बताया गया है कि इसका सबसे ज्यादा असर गरीब और मध्यम आय वाले देशों पर पड़ेगा। अध्ययन के प्रमुख एंथनी मैकडॉनेल के अनुसार, हमारे आकलन के मुताबिक, अगर एंटीबायोटिक प्रतिरोध की मौजूदा रफ्तार जारी रही, तो 2050 तक यह स्वास्थ्य सेवा पर सालाना 159 अरब डॉलर का अतिरिक्त बोझ पड़ेगा।

अध्ययन में इंसानी स्वास्थ्य और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर इसके प्रभाव का संयुक्त विश्लेषण किया गया है। हेल्थ बर्डन (बीमारी और मौत के बोझ) का अनुमान इंस्टीट्यूट फॉर हेल्थ मेट्रिक्स एंड इवैल्यूएशन (आईएचएमई) से लिया गया, जिसमें कहा गया है कि 2025 से 2050 के बीच एंटीबायोटिक प्रतिरोध की वजह से 3.85 करोड़ लोगों की जान जा सकती है यानी मृत्यु दर में 60 फीसदी तक की वृद्धि। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि अगर समय रहते कदम नहीं उठाए गए, तो ये समस्या वैश्विक स्वास्थ्य बजट का करीब 1.2% खा सकती है। साथ ही, यह भी चेताया गया है कि इससे निपटने के लिए बेहतर इलाज और नई दवाओं की खोज के प्रयास तेज करने होंगे। अध्ययन में यह अहम बात भी कही गई कि अगर एंटीबायोटिक प्रतिरोध से किसी की जान नहीं जाती, तो 2050 तक दुनियाभर की आबादी में 2.22 करोड़ लोग ज्यादा होते है.

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