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हिन्दू समाज मे मन मुटाव और आपसी भेदभाव की वजह से एकता असंभव

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हिन्दू समाज मे मन मुटाव और आपसी भेदभाव की वजह से एकता असंभव

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टेकचंद्र शास्त्री:

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9822550220

 

नई दिल्ली। पुरातन काल से सनातन हिन्दू धर्म समाज मे आपसी फूट मनमुटाव और भेदभाव की वजह से एकता असंभव है.हिन्दू धर्म में ऊंच-नीच की खाई, जात-पात की खाई और अमीर-गरीब की खाई से जुड़े विचार जटिल हैं, क्योंकि धार्मिक ग्रंथों की मूल अवधारणाओं और समाज में प्रचलित वास्तविक प्रथाओं के बीच अंतर है।

जात-पात और ऊंच-नीच

मूल अवधारणा (वर्ण व्यवस्था): हिन्दू धर्मग्रंथों, जैसे कि भगवद गीता और वेदों में, वर्ण व्यवस्था का उल्लेख है, जो लोगों को उनके गुणों और कर्मों (स्वभाव और कार्यों) के आधार पर चार श्रेणियों (ब्राह्मण, क्षत्रिय वैश्य और शूद्र) में विभाजित करती है। यह विभाजन एक आदर्श सामाजिक व्यवस्था के रूप में था, जहाँ एक व्यक्ति अपने कर्मों से अपना वर्ण बदल सकता था (जैसे, विश्वामित्र एक क्षत्रिय राजा से ब्रह्म ऋषि बने)।

सामाजिक कुरीति (जाति व्यवस्था): समय के साथ, यह लचीली वर्ण व्यवस्था जन्म-आधारित जाति व्यवस्था में बदल गई, जो कठोर हो गई। यह ऐतिहासिक विकास, कुछ लोगों के अनुसार, बाद में आई कुरीतियों का परिणाम है, न कि मूल धर्म का हिस्सा। समाज में व्याप्त इस जन्म-आधारित भेदभाव (छुआछूत सहित) को कई संतों, सुधारवादी आंदोलनों और आधुनिक कानूनों द्वारा चुनौती दी गई है। सच्चा सनातन धर्म वह माना जाता है जिसमें कोई जात-पात और भेदभाव नहीं है।

अमीर-गरीब की खाई

आध्यात्मिक असमानता के संबंधमें बता दें कि हिन्दू धर्म के अनुसार, सभी आत्माएँ (आत्मा) आध्यात्मिक स्तर पर समान हैं, भले ही शारीरिक या भौतिक स्थिति भिन्न हो। मोक्ष (पुनर्जन्म के चक्र से मुक्ति) सभी आत्माओं का अंतिम लक्ष्य है। धर्म भौतिक जीवन को पूरी तरह से त्यागकर एक सरल जीवन जीने (संन्यासी का जीवन) को आध्यात्मिक उद्देश्यों के लिए पुण्य भी मानता है। इसका मतलब यह नहीं है कि अमीरी या गरीबी में भेदभाव किया जाए. समाज में अमीर और गरीब के बीच की खाई एक सामाजिक-आर्थिक मुद्दा है, जो अक्सर असमानता और सामाजिक संबंधों में तनाव पैदा करता है। हिन्दू धर्मग्रंथों में भगवान द्वारा भक्तों के बीच अमीर या गरीब के आधार पर भेदभाव न करने की बात भी कही गई है।

संक्षेप में, हिन्दू धर्म के मूल ग्रंथ कर्म और गुणों पर आधारित एक आदर्श सामाजिक व्यवस्था की बात करते हैं और आध्यात्मिक समानता पर जोर देते हैं, जबकि वर्तमान में मौजूद ऊंच-नीच और अमीर-गरीब की गहरी खाई को सामाजिक कुरीतियों और ऐतिहासिक परिवर्तनों का परिणाम माना जाता है।

यह बात काफी हद तक सही है कि हिन्दू समाज में मौजूद आपसी भेदभाव, विशेष रूप से जाति व्यवस्था पर आधारित, एकता की राह में एक बड़ी बाधा है। कई लोगों का मानना है कि जब तक इस तरह के भेदभाव और छुआछूत को खत्म नहीं किया जाता, तब तक पूर्ण एकता हासिल करना मुश्किल है।

एकता की कमी के प्रमुख कारण हैं.

इसकी मुख्य वजह जातिगत विभाजन भी जिम्मेदार है.चुंकि हिन्दू समाज जातियों और उप-जातियों में बंटा हुआ है, और अक्सर एक समूह दूसरे के साथ भेदभाव करता है। यह विभाजन राजनीतिक ताकतों द्वारा भी अपने फायदे के लिए इस्तेमाल किया जाता रहा है। यह भी सत्य है कि हिन्दू समाज में संगठित नेतृत्व का भी अभाव है. हिन्दू धर्म में कोई एक केंद्रीय धार्मिक नेता या संगठनात्मक ढांचा नहीं है, जिससे सभी अनुयायी एक ही मान्यता प्राप्त मार्ग का अनुसरण करें। मान्यताओं और प्रथाओं में विविधता भी कभी-कभी मतभेद का कारण बनती है।

भारत एक विशाल देश है जहाँ विभिन्न क्षेत्रों में अलग-अलग रीति-रिवाज, भाषाएँ और सांस्कृतिक परंपराएँ हैं, जो स्थानीय स्तर पर मतभेद पैदा कर सकती हैं।कुछ लोगों का तर्क है कि व्यक्तिगत अहंकार, झूठ और स्वार्थ की भावनाएँ भी एकता को बाधित करती हैं।

हालांकि, यह भी ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि हिन्दू धर्म का मूल दर्शन “वसुधैव कुटुम्बकम” (पूरी दुनिया एक परिवार है) की बात करता है और कर्म के आधार पर किसी भी प्रकार के भेदभाव को नकारात्मक कर्म माना जाता है। कई समाज सुधारकों और आंदोलनों ने भी जातिगत भेदभाव को मिटाने और एकता को बढ़ावा देने का प्रयास किया है।

संक्षेप में, हिन्दू समाज में ऐतिहासिक और सामाजिक कारणों से मौजूद भेदभाव एकता में एक महत्वपूर्ण बाधा है, लेकिन कई विचारक और सामाजिक आंदोलन इसे दूर करने के लिए प्रयासरत हैं।

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