टेकचंद्र सनौडिया शास्त्री:सह-संपादक की रिपोर्ट
श्रीमद्भागवत भगवत गीता मे भगवान श्रीकृष्ण चंद्र ने बताया है कि निष्काम भक्ति के द्धारा दुराचारी मनुष्य भी परमात्मा को पा सकता है कि नहीं? परमात्मा की शरण में जाने से कौन-कौन मुक्त हो सकता है? भक्त क्यों बनना चाहिये? परमात्मा की स्थूल और सूक्ष्म उपासना क्यों करनी चाहिए? संतों की वाणी में स्थूल सूक्ष्म उपासना का वर्णन, स्थूल उपासना कैसे करें? सूक्ष्म
…..घोर दुराचारी यदि अनन्य भाव से परमात्मा को भजे , तो उसके अच्छे संकल्प के कारण वह साधु मानने – योग्य होता है । वह शीघ्र धर्मात्मा हो जाता है और सदा की शान्ति प्राप्त करता है ।
प्रभु परमात्मा के भक्त को भवसागर की नाशवन्त गतियों से मुक्ति मिल जाती है । जब पापयोनि में जन्म लेनेवाली स्त्रियाँ और शुद्र , जो भी परमात्मा की शरण लेते हैं , वे परम गति पाते हैं , तब पुण्ययोनि में जन्म लेकर जो भगवान के भक्त होते हैं , उनके लिए कहना ही क्या ? इसलिए हे लोगो ! इस अनित्य और सुखरहित लोक में जन्म लेकर भगवान का भजन करो । उनमें मन लगाओ , उनके भक्त बनो , उनके लिए यज्ञ करो और उन्हें प्रणाम करो । इस तरह उनमें परायण रहकर आत्मा को परमात्मा के साथ जोड़कर उनको पाओगे । परमात्मा के स्थूल – व्यक्त सगुण नररूप , सगुण देवरूप , अणु – से – अणु सूक्ष्म सगुण रूप , ॐ ( निर्गुण शब्द – ब्रह्म ) रूप और स्वरूप हैं । आत्मा का मिलाप या योग परमात्म – स्वरूप से होगा । मन सूक्ष्म – सगुण तक युक्ति से लग सकता है । मनविहीन चेतन – आत्मा जब निर्गुण शब्द – ब्रह्म ॐ में लगेगी , तब उससे आकृष्ट हो उसके लय स्थान ( परमात्म – स्वरूप ) तक पहुँचेगी । आत्मा – परमात्मा के एकीभाव
स्थूल – सगुण रूप के अतिरिक्त उनके सूक्ष्म – सगुण भाव को भी जानना और उनकी भी उपासना करनी चाहिए । इसलिए गीता में अणु से भी अणु रूप परमात्मा का वर्णन है । निर्गुन स्वरूप का भी ज्ञान प्राप्त हो , उनकी उपासना की जाय , इसलिए गीता में ॐ तथा अव्यक्त स्वरूप का भी वर्णन है । जैसे भाँति – भाँति के पहिरावे के बदलने से पहननेवाला नहीं बदलता , वह अपने तईं जो का सो ही रहता है , उसी तरह स्थूल – सूक्ष्म तथा सगुण – निर्गुण भावों में परमात्मा ही रहते हैं ।
केवल स्थूल सगुण रूप की ही उपासना से और उनकी कृपा से सूक्ष्म सगुण , निर्गुण शब्द – ब्रह्म ( ॐ ) तथा अव्यक्त स्वरूप परमात्मा के , आप – से – आप मिलने का विश्वास रखना तथा सूक्ष्म सगुण और निर्गुण की उपासना को अनावश्यक प्रतीत करना ठीक है।
केवल स्थूल – सगुण को ही हठपूर्वक पकड़े नहीं रहना चाहिए । इसीलिए लोकमान्य बालगंगाधर तिलकजी ने ‘ गीता – रहस्य ‘ के भक्ति – मार्ग प्रकरण में लिखा है- ‘ साधन की दृष्टि से यद्यपि वासुदेव – भक्ति को गीता में प्रधानता दी गई है , तथापि अध्यात्म – दृष्टि से विचार करने पर वेदान्त – सूत्र की नाईं ( वे ० सू ० , ४/१/४ ) गीता में भी यही स्पष्ट रीति से कहा है कि ‘ प्रतीक ‘ एक प्रकार का साधन है – वह सत्य , सर्वव्यापी और नित्य परमेश्वर हो नहीं सकता । अधिक क्या कहें ? नामरूपात्मक और व्यक्त अर्थात् सगुण वस्तुओं में से किसी को भी लीजिए , वह माया ही हैं ; जो सत्य परमेश्वर को देखना चाहे , उसे इस सगुण रूप के भी परे अपनी दृष्टि को ले जाना चाहिए । भगवान की जो अनेक विभूतियाँ हैं , उनमें अर्जुन को दिखलाए गए विश्वरूप से अधि क व्यापक भगवान ने नारद को दिखलाया , तब उन्होंने कहा है , ‘ तू मेरे जिस रूप को देख रहा है , यह सत्य नहीं है , यह माया है । मेरे सत्यस्वरूप को देखने के लिए इसके भी आगे तुझे जाना चाहिए ।
“अव्यक्तं व्यक्तिमापन्नं मन्यन्ते मामबुद्धयः । परं भावमजानन्तो ममाव्ययमनुत्तमम् ॥ ( गीता ७/२४ )
यद्यपि मैं अव्यक्त हूँ , तथापि मूर्ख लोग मुझे व्यक्त ( गीता ७/२४ ) अर्थात् मनुष्य – देहधारी मानते हैं ( गीता ९ -११ ) ; परन्तु यह बात सच नहीं है , मेरा अव्यक्त स्वरूप ही सत्य है । इसी तरह उपनिषदों में भी यद्यपि उपासना के लिए मन , वाचा , सूर्य , आकाश इत्यादि अनेक व्यक्त और अव्यक्त ब्रह्म – प्रतीकों का वर्णन किया गया है , तथापि अन्त में यह कहा है कि जो वाचा , नेत्र या कान को गोचर हो , वह ब्रह्म नहीं है । जैसे–
यन्मनसा न मनुते येनाऽहुर्मनो मतम् । तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते ॥ ( केनोपनिषद् , खण्ड १ , मंत्र ५ )
अर्थ – मन से जिसका मनन नहीं किया जा सकता , किन्तु मन ही जिसकी मनन – शक्ति में आ जाता है , उसे तू ब्रह्म समझ , जिसकी उपासना ( प्रतीक के तौर पर ) की जाती है , वह सत्य ब्रह्म नहीं है ।
‘ नेति नेति ‘ सूत्र का भी यही अर्थ है । मन और आकाश को लीजिए ; अथवा व्यक्त उपासना – मार्ग के अनुसार शालिग्राम , शिवलिंग इत्यादि को लीजिए ; या श्रीराम , कृष्ण आदि अवतारी पुरुषों की अथवा साधु पुरुषों की व्यक्त मूर्ति का चिन्तन कीजिए ; मंदिरों में शिलामय अथवा धातुमय देव की मूर्ति को देखिए ; अथवा बिना मूर्ति का मंदिर या मस्जिद लीजिए – ये सब छोटे बच्चे की लँगड़ी गाड़ी के समान मन को स्थिर करने के अर्थात् चित्त की वृत्ति को परमेश्वर की ओर झुकाने के साधन हैं । प्रत्येक मनुष्य अपनी – अपनी इच्छा और अधिकार के अनुसार उपासना के लिए किसी प्रतीक को स्वीकार कर लेता है । यह प्रतीक चाहे कितना प्यारा हो , परन्तु इस बात को नहीं भूलना चाहिए कि सत्य परमेश्वर इस ‘ प्रतीक ‘ में नहीं हैं ‘ – न प्रतीके न हिसः ( वे ० सू ० ४/१/४ ) -उसके परे है । यह मनुष्यों की अत्यन्त शौचनीय मूर्खता का लक्षण है कि वे इस सत्य तत्त्व को तो नहीं पहचानते कि ईश्वर सर्वव्यापी , सर्वसाक्षी , सर्वज्ञ , सर्वशक्तिमान और उसके भी परे अर्थात् अचिन्त्य है । किन्तु वे ऐसे नाम – रूपात्मक व्यर्थ अभिमान के अधीन हो जाते हैं कि ईश्वर ने अमुक समय , अमुक देश में , अमुक माता के गर्भ से , अमुक वर्ण का , नाम का या आकृति का जो व्यक्त स्वरूप ध रण किया , वही केवल सत्य है और इस अभियान में फंसकर एक – दूसरे की जान लेने तक को उतारू हो जाते हैं
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