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(भाग:228) हनुमानजी महराज ने माता सीताजी को अशोक वाटिका में बैठे देखा था तो आंखों से आंसू आ गए थे.

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भाग:228) हनुमानजी महराज ने माता सीताजी को अशोक वाटिका में बैठे देखा था तो आंखों से आंसू आ गए थे

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टेकचंद्र सनोडिया शास्त्री: सह-संपादक रिपोर्ट

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रामायण के अनुसार महावीर हनुमान जब सीताजी की खोज में लंका पहुंचे थे, वहां की शोभा और माया देखकर उन्‍हें बड़ा अचरज हो रहा था. पहली बात तो यह थी कि लंकानगरी में बिना आज्ञा लिए बाहर से कोई प्रवेश कर ही नहीं सकता था, लेकिन हनुमानजी सफल हो गए. फिर जब उन्‍होंने सूक्ष्म रूप धरकर लंका में सीताजी को ढूंढना शुरू किया तो लंका इतनी बड़ी और भव्‍य थी कि इधर-उधर फिरते हुए हनुमान भ्रमित होने लगे. उन्‍होंने रावण के महल का कोना-कोना छान मारा, लेकिन उन्‍हें सीताजी नहीं दिखीं.

रामायण के प्रसंगों का जिक्र करते हुए पंडित रामचंद्र जोशी बताते हैं कि एक जगह हनुमान को जब विभीषण का घर दिखा तो उन्‍हें अचरज हुआ. दरअसल, राक्षस होने के बावजूद विभीषण भगवान विष्‍णु के भक्‍त थे. हनुमानजी को उनके घर की चारदीवारों पर ईश्‍वरीय मुद्राओं के निशान दिखे थे.

इस बारे में रामचरितमानस में एक दोहा है-

राम नाम अंकित गृह शोभा वर्णि न जाय, नव तुलसी वृंद तेह हर्षि रुके कपि राय.

तब विभीषण-हनुमान दोनों मिलते हैं. विभीषण ही हनुमानजी को संकेत देते हैं कि सीताजी को रावण ने अशोक वाटिका में बंधक बना रखा है. विभीषण द्वारा दिए संकेत के अनुसार, हनुमान जी अशोक वाटिका की चारदीवारी के पास जा पहुंचे. वहाँ भयानक और सशस्त्र राक्षसों का पहरा था.

उन से बचने के लिए हनुमान जी ने एक बहुत छोटे से वानर का रूप धरा और वाटिका के अंदर एक पेड़ पर जा चढ़े. अशोक वाट‍िका में हनुमानजी जब घुसे तो उन्‍हें राक्षसियों के झुंड के बीच विशाल पेड़ के नीचे एक दिव्‍यजन्‍मा स्‍त्री नजर आईं. जो केसरिया व‍स्त्र पहने हुए थीं. उनके मुख पर तेज था. वह स्‍त्री सीताजी ही थीं.

हनुमानजी ने जब अशोक वृक्ष के नीचे सीताजी को देखा तो खुशी के आंसू आ गए. वाल्‍मीक‍ि रामायण के अनुसार, पहली बार हनुमानजी ने जिस पेड़ के नीचे सीताजी को देखा वो सिंसुपा था. कुछ लोग सिंसुपा को शीशम का पेड़ बताते हैं

किसने दिया हनुमान को माता सीता का पता

रामायण काल में जब श्री राम अपने भ्राता व अपनी अर्धांगिनी के साथ 14 साल के वनवास के लिए गए तो कथाओं के अनुसार वनवास खत्म होने से ठीक 1 साल पहले लंका के राजा द्वारा माता सीता का अपहरण कर लिया गया। जिसके बाद श्री राम व्याकुलता के साथ जंगलों में सीता माता की खोज करने लगे। इस दौरान उन्हें न केवल राक्षस का सामना करना पड़ा बल्कि बहुत से ऋषि मुनि आदि भी मिले। तो वहीं इसी दौरान श्री राम की भेंट अपने परम भक्त हनुमान जी से भी हुई, जिन्होंने माता सीता को ढूंढने का सारा भार अपने कंधों पर उठाया। श्री राम के संपूर्ण जीवन को दर्शाने वाली रामायण में किए वर्णन के अनुसार हनुमान जी ने माता सीता के पास जाने के लिए दुर्गम सागर को पार कर लंका पहुंच गए थे। मगर क्या आप ये जानते हैं कि सीता माता उन्हें किसने दिया था?

शायद बहुत कम ही लोग होंगे जिन्होंने इसके बारे में सोचा होगा कि हनुमान जी को सीता माता का पता किसने और कैसे दिया था?

तो आपको बता दें आज हम अपने इस आर्टिकल में हम आपको इसी के बारे में बताने वाले हैं। जी हां, हम आपको बताने वाले हैं रामायण काल से जुड़ा एक ऐसा ही तथ्य। कथाओं के अनुसार लंकापति रावण जब साधु का भेष बनाकर माता सीता का अपहरण कर उन्हें अपने पुष्पक विमान से लंका लेकर जाता है तो एक पक्षी द्वारा उसे रोकने का प्रयास किया जाता है। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार ये पक्षी कोई और नहीं बल्कि जटायु थे, जो एक गरुड़ पक्षी थे

माता सीता को बचाने के लिए जटायु ने शक्तिशाली रावण पर हमला बोल दिया था, परंतु शक्तिशाली रावण ने जटायु के पंख काट दिए जिससे जमीन पर आ गिरे। किंतु प्राण त्यागने से पहले श्री राम को रावण के बारे में बताया कि रावण द्वारा माता सीता को ले जाया गया है। आपकी जानकारी के लिए बता दें पौराणिक कथा के अनुसार जटायु के एक भाई भी थे जिनका नाम संपाती था, जो दोनों अरुण नाम के देवपक्षी की संतान थे। जो स्वयं अरुण प्रजापति कश्यप की संतान थे तथा इन्हीं के एक भाई थे जिन्हें गुरुड़ कहा जाता है। इसके अलावा बता दें सृष्टि के पालनकर्ता भगवान विष्णु के वाहन भी गरुड़ ही हैं तथा अरुण सूर्यदेव के सारथी हैं।

संपाती ने बताया माता सीता का पता

धार्मिक कथाओं के अनुसार रावण द्वारा प्रहार के कारण जब जटायु की मृत्यु हो गई तो, भगवान राम की मदद के लिए उनके सभी सहयोगी जुड़ गए। जिसमें उनके परम भक्त हनुमान, जामवंत, अंगद, सुग्रीव आदि थे। माता सीता की खोज करते-करते इन्ही में एक और नाम शामिल हुआ था जो था संपाती। शास्त्रों के अनुसार संपाती और कोई नहीं बल्कि जटायु के भाई थे। जिन्हें हनुमान जो ने रावण द्वारा सीता माता को ले जाने तक से लेकर जटायु जी को मृत्यु को प्राप्त हो जाने तक की पूरी घटना बताई थी।

प्रचलित कथाओं के अनुसार यह खबर सुनकर संपाती को अत्यंत दुख हुआ था जिसके बाद संपाती ने अपनी नज़रों को घुमाना आरंभ किया। शास्त्रों में ऐसा कहा गया है कि संपाती की नजरें बहुत तेज थीं और वे बहुत दूर तक देख सकते थे। अपनी दिव्य दृष्टि की मदद से हनुमान जी और जांबवंत को बताया था कि रावण माता सीता को लंका ले गया है। जिसके बाद हनुमान जी ने यह समाचार तुरंत भगवान श्री राम को दिया था।

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