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(भाग:231) हनुमान जी की सीख:बड़े काम की शुरुआत करने से पहले घर-परिवार के बड़े लोगों का आशीर्वाद जरूर लें

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(भाग:231) हनुमान जी की सीख:बड़े काम की शुरुआत करने से पहले घर-परिवार के बड़े लोगों का आशीर्वाद जरूर लें

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टेकचंद्र सनोडिया शास्त्री: सह-संपादक रिपोर्ट

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श्रीमद रामायण के अनुसार किसी भी काम की शुरुआत करने से पहले घर-परिवार और समाज के बड़े लोगों का आशीर्वाद और सलाह जरूर लेनी चाहिए। ऐसा करने से सकारात्मकता के साथ ही काम करने का साहस मिलता है। ये बात हम हनुमान जी से सीख सकते हैं।

 

रामायण का किस्सा है। हनुमान जी, जामवंत, अंगद और अन्य वानर सीता की खोज करते हुए संपाति के पास पहुंच गए थे। संपाति ने इन सभी को बता दिया था कि देवी सीता लंका में ही हैं।

 

हनुमान जी, जामवंत, अंगद और सभी वानर दक्षिण दिशा में समुद्र किनारे पहुंचे। वहां से लंका की दूरी करीब सौ योजन थी। इतना बड़ा समुद्र पार करके लंका पहुंचना था। वानरों के सामने समस्या ये थी कि समुद्र पार करके लंका कौन जाएगा?

 

सबसे पहले जामवंत ने कहा कि मैं अब बूढ़ा हो गया हूं और समुद्र पार लंका पहुंचना और सीता की खोज करके वापस लौटना मेरे लिए संभव नहीं है।

 

अंगद ने कहा कि मैं लंका जा तो सकता हूं, लेकिन वापस लौटकर आऊंगा, इसमें मुझे संदेह है।

 

उस समय हनुमान जी चुपचाप बैठे थे। जामवंत ने हनुमान जी को प्रेरित किया और कहा कि आपका तो जन्म ही रामकाज के लिए हुआ है, आप चुपचाप क्यों हैं? आप लंका जाइए और देवी सीता की खोज करके लौट आइए। जामवंत के प्रेरित करने पर हनुमान जी लंका जाने के लिए तैयार हो गए। उन्होंने जामवंत से पूछा कि आप बताइए, मुझे लंका जाकर क्या-क्या करना है और क्या नहीं करना है?

 

जामवंत ने हनुमान जी से कहा कि आप सिर्फ देवी सीता की खोज करके लौट आइए। लंका में आपको युद्ध नहीं करना है। आप लौट आइए और फिर श्रीराम रावण का अंत करेंगे। जामवंत जी की सलाह हनुमान जी ने ध्यान से सुनी। इसके बाद उन्होंने जामवंत को प्रणाम किया, उनका आशीर्वाद लिया। अन्य वानरों को नमन किया। इसके बाद हनुमान जी लंका की ओर चल दिए।

 

लंका पहुंचकर हनुमान जी सीता की खोज की, लंका को जलाया और फिर श्रीराम के पास लौट आए।

 

हनुमान जी की सीख

 

इस किस्से में हनुमान जी ने सीख दी है कि हमें जब भी कोई बड़ा काम करना हो तो घर-परिवार के बड़े लोगों से सलाह जरूर लेनी चाहिए और बड़ों का आशीर्वाद लेकर काम की शुरुआत करनी चाहिए। जब हम इस बात का ध्यान रखते हैं तो हमें सफलता जरूर मिलती है।

लंका दहन के पश्चात जब हनुमान जी श्रीराम एवं सुग्रीव जी के पास शिविर में वापस आये तो सभी ने हर्षोल्लास के साथ उनका स्वागत किया एवं उनकी वीरता का बखान करना शुरू कर दिया…श्रीराम जी ने भी उनकी भरपूर प्रशंसा की…

परंतु भक्त हनुमान जी.. जो कि अभी भी इस बात से व्यथित थे कि माता सीता किस हाल में लंका नगरी में अपने दिन काट रहीं हैं और वो चाहकर भी उन्हें वहाँ से लाने में असमर्थ रहे (हालाँकि हनुमान जी ने सीता माता से उनके साथ चलने का आग्रह किया था परंतु माता सीता ने उन्हें ये कहकर मना कर दिया कि अब प्रभू राम स्वयं ही आकर उन्हें यहाँ से ले जाएंगे) वो इतनी प्रशंसा पाकर असहज हो गए तथा उन्होंने बड़ी ही विनम्रता से अपने इस काम का श्रेय प्रभू श्रीराम की कृपा तथा बाकी लोगों (जैसे जामवंत जी, माता सीता एवं विभीषण) को दे दिया….

 

हनुमान जी के शब्दों को परिकल्पित करके इस रचना के माध्यम से आप सभी तक पहुँचाने का प्रयास किया है…आशा है आप सभी इन भावों से जुड़ पाएंगे…

 

लंक विध्वंस किए हनुमाना

रघुराई अति किए बखाना

तुम्हरी भुजा है शक्ति अपारा

महाबली तुम जग पहिचाना

 

लांघ जलधि जो पहुँचे लंका

करेउ दूर सीता की शंका

कूद फांद वाटिका उजारी

चहुँ दिशा में तुम्हरा डंका

 

हनुमान उवाच:-

 

नाथ सकल ये कृपा तुम्हारी

मैं सेवक सेवा ही प्यारी

आज्ञा पाई सिया सुधि लाऊं

पालन को जाऊं बलिहारी

 

हुई मंत्रणा पार कोउ जाए

लांघ जलधि कोउ पता लगाए

कथा दिवाकर बाल्यकाल की

जामवंत तब स्मरण कराए

 

आपन शक्ति कबहुँ ना जाना

वानर साधारण सा हनुमाना

धन्यवाद श्री जामवंत का

सेवक की शक्ति को पहिचाना

 

लंका पहुँच हुआ दुःख भारी

दिखी कहीं ना सीता महतारी

पूर्ण दिवस थी छानी लंका

मन ही मन में मानी हारी

 

कृपा प्रभू अद्भुत दिखलाए

राम नाम की ध्वनि सुनाए

लंका में सुमिरै नाम तिहारा

भक्त विभीषण प्रभू मिलाए

 

जो मिलते ना रावण के भ्राता

उस स्थल को ढूंढ़ ना पाता

मिलती कैसे ‘अशोक वाटिका’

वियोग में थी जहाँ सीता माता

 

पहुँच वाटिका काज ये कीन्हा

चूड़ामड़ी मात को दीन्हा

भेंट दिए प्रभू स्वयं आप ही

तुम्हरी कृपा मात मोहि चीन्हा

 

मात की आज्ञा से फल खाए

सकल असुर तब पाछे आए

मात कृपा से शक्ति पाई

मारी लात धाम पहुँचाए

 

सुनी खबर रावण खिसियाया

अक्षय कुमार था युद्ध को आया

आशीष मात का कृपा ऐसी

मुष्टि प्रहार से प्राण गंवाया

 

अति क्रोधित रावण खिसियाना

पठएसि मेघनाद बलवाना

तुम्हरी कृपा समर्पण कीन्हा

शस्त्र वो नागपाश पहिचाना

 

कर विमर्श ये लंकापति कीन्हा

दूत समझ मोहे मृत्यु ना दीन्हा

पूँछ मोरे फिर अनल लगाए

प्रतिशोध पुत्र मृत्यु का लीन्हा

 

वानर ने तब पूँछ बढ़ाई

लंका में फिर आग लगाई

पूर्ण काज फिर आपन कीन्हा

पूँछ मोरी की अनल बुझाई

 

कृपा आपकी जो कर पाया

लंका से माता सुधि लाया

राम नाम की महिमा ऐसी

सहयोग सभी का मैंने पाया

 

अब विनती यह प्रभू हमारी

रावण संहार की करें तैयारी

दशरथ नंदन की आस में व्याकुल

राह तके हैं जनक दुलारी

 

और इस प्रकार भक्त हनुमान जी ने बड़ी सरलता से सारा श्रेय अपने प्रभू को दे दिया और साथ ही उनसे माता सीता को शीघ्र वापस लाने की विनती की…..

हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि हनुमानजी ने दोनों भाई राम लक्ष्मण को अपने पीठ पर बैठाकर सुग्रीव के पास पर्वत पर ले गए। पीठ पर बैठाकर ले जाने का मर्म बताते हुए कहा कि हनुमान जी के पीठ पर श्रीराम के बैठाने में भी रहस्य छिपा है। हनुमान जी ने सोचा कि प्रभु श्रीराम मेरे पीठ छुुपने का रहस्य बहुत ही बडा है।

 

हनुमानजी के पीठ पर श्रीराम को बैठाने में छिपा है रहस्य

देवरिया: क्षेत्र के बारीपुर हनुमान मंदिर परिसर में चल रहे श्रीराम कथा के अंतिम दिन बुधवार को मानस मर्मज्ञ राजन महाराज ने सीता खोज, हनुमान सुग्रीव से मित्रता, रावण-दहन व राम के वापस अयोध्या लौटने की कथा को रोचक ढंग से सुनाया।

कहा कि हनुमान दोनों भाई राम लक्ष्मण को अपने पीठ पर बैठाकर सुग्रीव के पास पर्वत पर ले गए। पीठ पर बैठाकर ले जाने का मर्म बताते हुए कहा कि हनुमान जी के पीठ पर श्रीराम के बैठाने में भी रहस्य छिपा है। हनुमान जी ने सोचा कि प्रभु श्रीराम मेरे पीठ पर बैठेंगे तो मुझे पकड़े रहेंगे और जिसको प्रभु पकड़ेंगे। उसे दुनिया की कोई ताकत गिरा नहीं सकती।

इसके पूर्व श्रीराम के राज्याभिषेक का प्रसंग सुन मौजूद लोग भाव विभोर हो गए। श्रीराम ने सुग्रीव से मित्रता निभाते हुए बालि का वध कर सुग्रीव को राजा व अंगद को युवराज बनाया। कुछ समय बीतने पर सुग्रीव राज-पाट में लगकर श्रीराम के कार्य भगवती सीता की खोज करना भूल जाते हैं। उन्होंने कहा कि मनुष्य को ईश्वर की याद तभी आती है जबतक उनके जीवन में दुख आता रहता है। सीता की खोज में निकले जामवंत व हनुमान से जटायु के भाई संपाती की भेंट होती है और जामवंत के द्वारा हनुमान को राम काज के लिए प्रेरित किया जाता है। तब हनुमान लंका के लिए प्रस्थान करते हैं। वहां सीता से हनुमान की सुखद मुलाकात के साथ-साथ संवाद होता है। उसके बाद अशोक वाटिका में हनुमान के तांडव, अक्षय कुमार वध, लंका दहन, सीता का आशीर्वाद लेकर वापस, प्रभु श्रीराम को सीता खोज की खबर, राम सेना का लंका प्रस्थान,विभीषण से मैत्री उनका राज्याभिषेक, रावण वध और पुष्पक विमान से वापसी व राज्याभिषेक की कथा कहते हुए मानस मर्मज्ञ राजन महाराज ने कथा को विश्राम दिया। कथा के अंतिम दिन हजारों की संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे। बारीपुर मंदिर के उत्तराधिकारी गोपाल दास महाराज ने सभी अतिथियों व आगंतुकों के प्रति आभार जताया।

 

इस अवसर पर मंदिर के महंत शिव चरण दास, अंगद तिवारी, डा. मधुसूदन मिश्रा, विनय तिवारी वंटी, बब्बू शाही, नीतीश कुमार यादव, गजेन्द्र मिश्रा, अर्चना मिश्रा आदि लोग मौजूद रहे

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