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(भाग:236) लंका पहुंची मर्यादा मपुरुषोत्तम श्रीराम की सेना? दोनो तरफ से घनघोर युद्ध शुरु। रामलीला मंचन

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भाग:236) लंका पहुंची मर्यादा मपुरुषोत्तम श्रीराम की सेना? दोनो तरफ से घनघोर युद्ध शुरु। रामलीला मंचन

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टेकचंद्र सनोडिया शास्त्री: सह-संपादक रिपोर्ट

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दशहरा महोत्सव के अवसर पर श्री रामलीला कमेटी होशियारपुर द्वारा आयोजित रामलीला के नौवें दिन मंगलवार को लक्ष्मण मूर्छा का मंचन किया गया। रावण सीता का हरण कर अशोक वाटिका ले गया तो प्रभु राम सीता के वियोग में भटकने लगे। भटकते-भटकते रास्ते में उन्हे घायल जटायु मिले। जटायु ने बताया कि लंकापति रावण सीता माता को दक्षिण दिशा की तरफ ले गया है। इतना कह कर उसने प्राण त्याग दिए। सीता को खोजते-खोजते राम व लक्ष्मण की मुलाकात वीर हनुमान से हुई। हनुमान ने सुग्रीव से प्रभु राम की मित्रता करवाई तथा आपस में एक-दूसरे की सहायता करने का वचन दिया। राम ने सुग्रीव के भाई बाली का वध कर उनका राज्याभिषेक किया तथा बाली पुत्र अंगद को युवराज पद से सुशोभित किया। इसके बाद भगवान राम तथा लक्ष्मण एक पर्वत पर वास करने लगे। वर्षा ऋतु के बाद भी जब सुग्रीव ने भोग-विलास में लिप्त होने के कारण अपना वचन नहीं निभाया तो राम क्रोधित हो गए। तब सुग्रीव ने वानर सेना को चारों दिशाओं में माता सीता की खोज के लिए भेजा। सुग्रीव ने हनुमान, अंगद, नल, नील व जामवन्त जैसे योद्धाओं को दक्षिण दिशा की तरफ भेजा। हनुमान समुद्र लांघ कर रावण की नगरी लंका पहुंचे। वहां उनकी भेंट रावण के भाई रामभक्त विभीषण से हुई। फिर हनुमान अशोक वाटिका पहुंचे तथा सीता माता को चिन्ह स्वरूप प्रभु राम की अंगूठी देकर अशोक वाटिका को उजाड़ कर लंका दहन करते हुए राम के पास पहुंचे। राम वानर सेना के साथ समुद्र-तट पर पहुंचे और समुद्र देव से रास्ता देने की प्रार्थना की। समुद्र के कहने पर नल व नील की सहायता से पत्थरों का पुल बनाया। तत्पश्चातं् अंगद को दूत बनाकर रावण के पास भेजा। फिर भी अभिमानी रावण नहीं माना तो राम ने वानरों के साथ ले लंका पर चढ़ाई कर दी। दोनों ओर से घमासान युद्ध होने लगा। मेघनाद व लक्ष्मण में युद्ध होने लगा। मेघनाद ने शक्ित बाण से लक्ष्मण को मूर्छित कर दिया।

इस अवसर पर हजारों रामभक्तों के अलावा श्री रामलीला कमेटी अध्यक्ष शिव सूद, मुख्य संरक्षक अरूण डोगरा (मिक्की), चेयरमैन गोपी चंद कपूर, संचालक लाला जुगल किशोर, कार्यकारी अध्यक्ष सेठ नवदीप कुमार अग्रवाल, महासचिव प्रदीप हांडा, डा. बिन्दुसार शुक्ला, मुख्यसचिव सुभाष चंद्र गुप्ता, मुख्य मेला प्रबन्धक शिव जैन, नीतिन गुप्ता, कोषाध्यक्ष संजीव एरी, चीफ शोभा यात्रा इंचार्ज दविंद्र नाथ बिंदा, जीवन ज्योति कालिया, रविंद्र सैनी, मैनेजर शाम सुन्दर मोदगिल, संदीप जोशी, महाप्रबन्धक विनोद कपूर, अध्यक्ष सम्मान समारोह अरुण गुप्ता, योगेश कुमरा, वरिष्ठ उप-प्रधान विश्वानाथ बंटी, चीफपिड़पति पं. नरोतम शर्मा, पिड़पति जोगिन्द्रपाल हाडा, अजय जैन, मुख्यसलाहकार राकेश सूरी, मीडिया प्रभारी कमल वर्मा, चीफ प्रचार मंत्री मनोहर लाल जैरथ, मुख्य संयोजक दविन्द्र शर्मा पाली, मुख्य रूप से उपस्थित आरएसएस के विभाग प्रचारक प्रमोद, आरएसएस के जिला प्रचारक परशोतम, जतिंद्र रिवाड़ी, शील सूद, हरीश खोसला, राम कुमार, मनीष गुप्ता, अशीष वर्मा, चेतन सूद, विपन वालिया, रघुवीर बंटी, कपिल हाडा, कृष्ण चौबे, योगेश चौबे, सुमेश सोनी, दिनेश गुप्ता , अनील जैन, पं. संध्या प्रकाश, विक्रम मेहता, अंकुश वालिया, विकास अग्रवाल आदि मौजूद है

 

दातारपुर में आयोजित दशहरा कमेटी द्वारा आयोजित रामलीला में श्री राम सीता जी की खोज में किषिकंधा पहुंचे जहां उनकी सुग्रीव से मित्रता हुई। राम ने मित्र धर्म निभाते हुए बाली का वध कर दिया। सुग्रीव ने श्री राम की सेना का गठन किया। हनुमान जी सेनापति बने। अंगद, नल नील तथा जामवंत भी श्री राम के सात समुद्र तट पर पहुंचे। जहां श्री राम की प्रेरणा से श्री हनुमान जी समुद्र लांघ कर लंका पहुंचे। अशोक वाटिका में सीता जी को ढूंढा और उन्हें श्री राम जी की अंगूठी देकर सांत्वना दी। हनुमान जी ने अशोक वाटिका उजाड़ दी। हनुमान ने वापिस आकर श्री राम को सारा वृतांत सुनाया। श्री राम ने राम सेतु बना कर लंका पर चढ़ाई कर दी। कमाही देवी में भी आज बली वध तथा सेतु निर्माण का प्रसंग दिखाया गया। इसी प्रकार सधनो की रामलीला में रावण राम युद्ध में इंद्रजीत मेघनाथ और अक्षय कुमार मारे गए। रावण को मंदोदरी ने समझाया अब भी श्री राम की शरण में चले जाओ पर अभिमानी रावण ने एक न मानी।

श्री रामलीला में श्रीबालाजी सरकार रामलीला समिति दबोह के कलाकारों ने लंका दहन का मंचन किया। जिसे देखकर दर्शक भी मंत्रमुग्ध हो गए। लंका दहन के उपरांत हनुमान जी श्रीराम को सीता का समाचार देते हैं। भगवान श्रीराम सुग्रीव और हनुमान के साथ वानरों की सेना लेकर समुद्र किनारे पहुंचते हैं और समुद्र पर रामसेतु का निर्माण कर लंका पर चढ़ाई करते है।

 

भगवान राम जब वानरों की विशाल सेना लेकर लंका पहुंच गए तो रावण हैरान रह गया। रावण अपनी विशाल सेना को भगवान राम और लक्ष्मण से युद्घ के लिए भेजा, लेकिन वानर सेना की सहायता से भगवान राम सेना सहित रावण के सेनापति का वध करने में सफल हुए। इससे रावण का क्रोध बढ़ गया और उसने अपने पुत्रों को युद्घ के लिए भेजा।

 

रावण के पुत्रों में मेघनाथ सबसे पराक्रमी था। माना जाता है कि जब इसका जन्म हुआ तब इसने मेघ के समान गर्जना की इसलिए यह मेघनाद कहलाया। मेघनाद ने रण भूमि में आकर राम और लक्ष्मण को युद्घ के लिए ललकारा। इसने राम लक्ष्मण पर दिव्य बाण चलाया जो नागपाश में बदल गया। इससे राम लक्ष्मण मूर्छित होकर गिर पड़े। राक्षस सेना में खुशी लहर छा गई, जबकि वानर सेना का मनोबल टूटने लगा। इस दौरान बड़ी संख्या में दर्शकों की भीड़ पंडाल में मौजूद रही।

भगवान राम ने रावण से युद्ध अपनी वानर सेना के साथ किया था. इस सेना में एक लाख वानर सैनिक थे. युद्ध में राम की जीत के बाद वानर सेना का कोई जिक्र नहीं मिलता. वह कहां गई. जानते है।

वानर सेना अपने आपमें एकदम अलग और खास तरह की सेना थी. वानर सेना अपने आपमें एकदम अलग और खास तरह की सेना थी. दुनिया की अनोखी और अपने आपमें एकदम अलग थी ये राम की वानर सेना। जब ये सेना लंका पहुंची तो रावण ने हंसी उड़ाते हुए कहा – ये वानर क्या युद्ध लड़ेंगे

भगवान राम और रावण के बीच लंका में जो जबरदस्त युद्ध हुआ, उसमें एक ओर थी बलशालियों से भरी रावण की सेना, जिसे बहुत ताकतवर माना जाता था. दूसरी ओर राम के पास एक ऐसी सेना थी, जिसने इससे पहले शायद ऐसा कोई युद्ध लड़ा था. युद्ध में वो पारंगत भी नहीं थी. दरअसल राम की ये सेना आनन-फानन में ही बनी थी. ये वानर सैनिकों वाली सेना थी. रावण ने पहले इस सेना की हंसी उड़ाई. फिर राम की वानर सेना से दुश्मन के छक्के छुड़ा दिए. ये युद्ध जीता. लेकिन इस शानदार विजय के बाद वानर सेना का क्या हुआ, ये किसी को नहीं मालूम.

 

भगवान राम जब युद्ध करने के लिए लंका पहुंचे. उन्होंने रावण की मजबूत सेना के खिलाफ युद्ध शुरू किया तो उनकी सेना में केवल वानर थे. इस सेना को राम और लक्ष्मण ने मोटे तौर पर दीक्षित किया. युद्ध में जीत के बाद ये लंबी चौड़ी सेना कहां चली गई. उसका कोई जिक्र क्यों नहीं मिलता.

 

वाल्मीकि रामायण के अनुसार श्रीराम-रावण युद्ध में वानर सेना की महत्वपूर्ण भूमिका थी.सवाल यह है कि जब श्रीराम ने युद्ध जीत लिया. वह इसके बाद अयोध्या आ गए तो वानर सेना का क्या हुआ. इस वानर सेना का नेतृत्व करने वाले उस समय के महान योद्धा सुग्रीव और अंगद का क्या हुआ.

 

रामायण के उत्तर कांड में उल्लेख है कि जब लंका से सुग्रीव लौटे तो उन्हें भगवान श्रीराम ने किष्किन्धा का राजा बनाया. बालि के पुत्र अंगद को युवराज. इन दोनों ने मिलकर वहां कई सालों तक राज किया. श्रीराम-रावण युद्ध में योगदान देने वाली वानर सेना सुग्रीव के साथ ही वर्षों तक रही. लेकिन इसके बाद उसने शायद की कोई बड़ी लड़ाई लड़ी.

 

वानर सेना के अहम सेनानियों ने क्या किया फिर

हालांकि इस वानर सेना में अहम पदों पर रहे सभी लोग किष्किंधा में अहम जिम्मेदारियों में जरूर रहे. वानर सेना में महत्वपूर्ण योगदान देने वाले नल-नील कई वर्षों तक सुग्रीव के राज्य में मंत्री पद पर सुशोभित रहे तो युवराज अंगद और सुग्रीव ने मिलकर किष्किन्धा के राज्य को ओर बढ़ाया. गौरतलब है कि किष्किंधा आज भी है.

 

वानर सेना को श्रीराम ने किष्किंधा के आसपास के कई राज्यों से एकत्र किया था. फिर आनन फानन में उन्होंने इन्हें युद्ध के लिए दीक्षा देकर कुशल बनाया.

कहां है किष्किंधा की गुफाएं

किष्किंधा कर्नाटक में तुंगभद्रा नदी के किनारे है. ये बेल्लारी जिले में आता है जबकि विश्व प्रसिद्ध हम्पी के बिल्कुल बगल में है. इसके आसपास प्राकृतिक खूबसूरती बिखरी हुई है. किष्किंधा के आसपास आज भी ऐसे कई गुफाएं हैं और जगह हैं, जहां राम और लक्ष्मण रुके थे. वहीं किष्किंधा में वो गुफाएं भी हैं जहां वानर साम्राज्य था. इन गुफाओं में अंदर रहने की खूब जगह है.

 

दंडकारण्य भी यहीं है

किष्किंधा के ही आसपास काफी बड़े इलाके में घना वन फैला हुआ है, जिसे दंडक वन या दंडकारण्य वन कहा जाता है. यहां रहने वाली ट्राइब्स को वानर कहा जाता था, जिसका अर्थ होता है वन में रहने वाले लोग. रामायण में किष्किंधा के पास जिस ऋष्यमूक पर्वत की बात कही गई है वह आज भी उसी नाम से तुंगभद्रा नदी के किनारे स्थित है.यहीं पर हनुमानजी के गुरु मतंग ऋषि का आश्रम था.

 

कैसे राम ने बनाई वानरों की विशाल सेना

जब ये पक्का हो गया कि सीता को रावण ने कैद करके लंका में रखा हुआ है तो आनन फानन में श्रीराम ने हनुमान और सुग्रीव की मदद से वानर सेना का गठन किया. लंका की ओर चल पड़े. तमिलनाडु की एक लंबी तटरेखा है, जो लगभग 1,000 किमी तक विस्‍तारित है.

 

कोडीकरई समुद्र तट वेलांकनी के दक्षिण में स्थित है, जो पूर्व में बंगाल की खाड़ी और दक्षिण में पाल्‍क स्‍ट्रेट से घिरा हुआ है. यहां श्रीराम की सेना ने पड़ाव डाला.श्रीराम ने अपनी सेना को कोडीकरई में इकट्ठा करके सलाह मंत्रणा की.

 

इन्हीं वानरों ने समुद्र पर लंका तक के लिए पुल बनाया

इसी वानर सेना ने फिर रामेश्वर की ओर कूच किया, क्योंकि पिछली जगह से समुद्र पार होना मुश्किल था. श्रीराम ने रामेश्वरम के आगे समुद्र में वह स्थान ढूंढ़ निकाला, जहां से आसानी से श्रीलंका पहुंचा जा सकता हो. इसके बाद विश्‍वकर्मा के पुत्र नल और नील की मदद से वानरों ने पुल बनाना शुरू कर दिया.

 

वानर सेना में कितने थे सैनिक

वानर सेना में वानरों के अलग अलग झुंड थे. हर झुंड का एक सेनापति था. जिसे यूथपति कहा जाता था। यूथ अर्थात झुंड. लंका पर चढ़ाई के लिए सुग्रीव ने ही वानर तथा ऋक्ष सेना का प्रबन्ध किया. बताया जाता है कि ये वानर सेना जुटाई गई थी. ये संख्या में करीब एक लाख के आसपास थी.

 

ये कई राज्यों से मिलाकर बनी सेना थी

ये सेना राम के कुशल प्रबंधन और संगठन का परिणाम थी. विशाल वानर सेना छोटे -छोटे राज्यों की छोटी-छोटी सेनाओं व संगठनों जैसे किष्किंधा ,कोल ,भील ,रीछ और वनों में रहने वाले रहवासियों आदि का संयुक्त रूप थी.

 

सेना फिर अपने राज्यों के अधीन हो गई

माना जाता है कि लंका विजय के बाद ये विशाल वानर सेना फिर अपने अपने राज्यों के अधीन हो गई. क्योंकि अयोध्या की राजसभा में राम ने राज्याभिषेक के बाद लंका और किष्किंधा आदि राज्यों को अयोध्या के अधीन करने के प्रस्ताव को ठुकरा दिया

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