नवरात्रि का सातवां दिन मां कालरात्री देवी की अराधना का महत्व
टेकचंद्र शास्त्री:
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देवी भागवत पुराण के अनुसार नवरात्रि के सातवें दिन माँ दुर्गा के सातवें स्वरूप माँ कालरात्रि की पूजा की जाती है। यह दिन दुष्टों के विनाश और अज्ञान अंधकार यानी (नकारात्मकता) को दूर करने और भय से मुक्ति पाने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। माँ कालरात्रि की आराधना से भक्तों में साहस, निर्भयता और आत्मविश्वास का संचार होता है।
माँ कालरात्रि आराधना का महत्व के संबंध में बता दें कि मां कालरात्रि की अराधना करने से भक्तों मे
भय और नकारात्मकता का नाश होता है. माँ कालरात्रि का रूप भयावह है, लेकिन वे भक्तों के लिए ‘शुभंकरी’ (शुभ फल देने वाली) हैं। इनकी पूजा से सभी प्रकार के डर (अग्नि, जल, जंतु, शत्रु) दूर होते हैं।
शनि दोष से मुक्ति मिल सकती है. ज्योतिषीय मान्यता के अनुसार, माँ कालरात्रि शनि ग्रह को नियंत्रित करती हैं, इसलिए इनकी पूजा से शनि दोष, साढ़ेसाती या ढैया का प्रभाव कम होता है।
शत्रु बाधा का अंत होना संभव है. नकारात्मक शक्तियों और शत्रुओं से रक्षा के लिए सप्तमी के दिन विशेष पूजा-अर्चना की जाती है।
इससे आत्मिक शक्ति का संचार उत्पन्न होता है.यह पूजा साधक में निर्भयता और आंतरिक शक्ति को बढ़ाती है।
पूजा विधि और भोग:
मंत्र: “ॐ ऐं ह्रीं क्लीं कालरात्र्यै नमः” या “ॐ क्रीं चामुंडायै विच्चे” का जाप करें।
भोग: माँ कालरात्रि को गुड़ या गुड़ से बनी वस्तुओं का भोग लगाना चाहिए।
रंग: इस दिन बैंगनी या नीले रंग के वस्त्र पहनना शुभ माना जाता है।
स्वरुप: माँ कालरात्रि का वर्ण अंधकार की तरह काला, तीन नेत्र, और चार भुजाएं हैं, जिसमें वे खड्ग (तलवार) और लौह-कांटा धारण करती हैं। वे गधे (गर्दभ) की सवारी करती हैं
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