Breaking News

(भाग:91) प्रकृति-पृथ्वी परमात्म का संतुलन बनाए रखने लिए नैसर्गिक नियमों का परिपालन अनिवार्य है?

Advertisements

भाग:91) प्रकृति-पृथ्वी परमात्म का संतुलन बनाए रखने लिए नैसर्गिक नियमों का परिपालन अनिवार्य है?

Advertisements

टेकचंद्र सनोडिया शास्त्री:सह-संपादक की रिपोर्ट

Advertisements

वैदिक सनातन हिन्दू धर्म के अनुसार मानव शरीर अलग वस्तु है, और आत्मा अलग वस्तु। “शरीर जड़ है, और आत्मा चेतन है। शरीर का भोजन अलग है, आत्मा का भोजन अलग है।” दाल-रोटी सब्जी खीर पूरी हलवा मिठाई आदि यह शरीर का भोजन है। और शरीर की रक्षा के लिए धन संपत्ति वस्त्र मकान मोटर गाड़ी आदि वस्तुओं की आवश्यकता पड़ती है। उनको भी प्राप्त करना चाहिए।
“आत्मा का भोजन अलग है। वह है शुद्ध ज्ञान और शुद्ध आनन्द। यदि आत्मा को शुद्ध ज्ञान और शुद्ध आनन्द मिले, तो इससे आत्मा को तृप्ति मिलती है। वह प्रसन्न हो जाता है, सुखी हो जाता है।”
अब संसार के लोगों में भ्रांति यह है, कि *”वे जब भोजन आदि खाते हैं, तब शरीर को आत्मा मान लेते हैं। और यह समझते हैं कि भोजन मुझ आत्मा में जा रहा है।” स्वार्थी तो स्वभाव से सभी लोग हैं। *”इसलिए वे अपने स्वार्थ के लिए अपनी आत्मा को पुष्ट करने के लिए बलवान और दीर्घजीवी करने के लिए वे लोभ आदि दोषों में फंस जाते हैं, और दूसरों का भोजन भी छीनकर खाना चाहते हैं।” “इसी लोभ आदि दोषों के कारण वे दूसरों की धन संपत्ति आदि वस्तुओं पर भी बुरी दृष्टि रखते हैं। उन्हें भी हथियाने की बात सोचते हैं। यह भयंकर अविद्या है।”
वास्तव में सत्य तो यह है, कि *”चाहे कोई व्यक्ति 100 ग्राम भोजन खाये, या 500 ग्राम। उसकी आत्मा में तो 1 माइक्रो मिलीग्राम भी भोजन प्रवेश नहीं करता।” “अर्थात जो भोजन है, वह स्थूल वस्तु है, जड़ वस्तु है। वह चेतन आत्मा में प्रवेश नहीं करती।” भोजन खाने से बस इतना लाभ होता है, कि “आत्मा को जो भूख के कारण कष्ट हो रहा था, वह दूर हो जाता है, और थोड़ा सा सुख भी मिल जाता है। क्षणिक सुख।” “परंतु कोई भी भोजन आत्मा में प्रवेश नहीं करता।” “यदि यह बात लोगों को समझ में आ जाए, तो व्यक्ति 100 ग्राम भोजन खाए, या 500 ग्राम खाए, इससे कोई अंतर नहीं पड़ता।” “बस, इतनी मात्रा में भोजन मिल जाना चाहिए, कि भूख मिट जाए।” इतना भोजन तो सबको आसानी से मिल ही जाता है, फिर छीन झपट क्यों करें? *”लोभ आदि दोषों के कारण दूसरे का अधिकार क्यों छीनें? इससे भयंकर पाप लगता है, और ईश्वर भविष्य में, पशु पक्षी वृक्ष आदि योनियों में बहुत भयंकर दंड देता है।”
इसलिए ऐसे पापों से बचें। “आप आत्मा हैं, शरीर नहीं।” “इस बात को प्रतिदिन दोहराएं। वर्षों तक दोहराएं। हजारों बार दोहराएं।” ऐसा करने से यह बात आपके अंदर बैठ जाएगी, और आपकी भ्रांति भी दूर हो जाएगी। “तब आप ऐसे पाप कर्मों से बच पाएंगे, और ईश्वर के दंड से भी बच पाएंगे।”
यदि आप प्रसन्न रहना चाहते हैं, तो *”आत्मा को भोजन देवें। वेदों को पढ़कर शुद्ध ज्ञान की प्राप्ति करें। ईश्वर की उपासना करके, समाज सेवा परोपकार आदि कर्म करके, शुद्ध आनन्द की प्राप्ति करें। यही तो आत्मा का वास्तविक भोजन है।” “इस भोजन को प्राप्त करें और आनन्द से अपना जीवन जीएं। लोभ के कारण छीन झपट आदि पाप कर्मों से भी बचें और भविष्य में ईश्वर का दंड भोगने से भी बचें।” तदहेतु प्रकृति-पृथ्वी का संतुलन बनाए रखने के लिए नैसर्गिकनियमों का परिपालन करना अनिवार्य है

*प्रस्तुति:-“स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक, निदेशक दर्शन योग महाविद्यालय, रोजड़ गुजरात।”*

Advertisements

About विश्व भारत

Check Also

मां वैनगंगा परिक्रमा यात्रा से लौटे शिवशक्ति उपासक भक्तगण

मां वैनगंगा परिक्रमा यात्रा से लौटे शिवशक्ति उपासक भक्तगण टेकचंद्र सनोडिया शास्त्री: 9822550220   सिवनी। …

चरित्रहीन पर स्त्रीगमन और पर पुरुष व्यभिचरिणी के यहां जलपान वर्जित

चरित्रहीन पर स्त्रीगमन और पर पुरुष व्यभिचरिणी के यहां जलपान वर्जित टेकचंद्र सनोडिया शास्त्री: संयुक्त …

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *