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(भाग:280)जिस व्यक्ति में ईश्वरीयपूर्ण प्रेम भक्ति,आस्था और करुणा है, ईश्वर उसके भीतर विराजमान है

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भाग:280)जिस व्यक्ति में ईश्वरीयपूर्ण प्रेम भक्ति,आस्था और करुणा है, ईश्वर उसके भीतर विराजमान है

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टेकचंद्र सनोडिया शास्त्री: सह-संपादक रिपोर्ट

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यजुर्वेद में कहा गया है कि परमेश्वर ऊपर से, नीचे से, बीच से, इधर-उधर से किसी भी तरह किसी की पकड़ या अधीन में नहीं आ सकता है। जिस व्यक्ति में प्रेम और करुणा है, ईश्वर उसके भीतर विराजमान है

जिस व्यक्ति में प्रेम और करुणा है, ईश्वर उसके भीतर विराजमान है

 

सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि।

ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शन:।। 21।।

 

शब्दार्थ : सर्व-भूत-स्थम्—सभी जीवों में स्थित; आत्मानम्—परमात्मा; सर्व—सभी; भूतानि —जीवों को; च—भी; आत्मनि—आत्मा में; ईक्षते— देखता है; योग-युक्त-आत्मा—कृष्ण चेतना में लगा व्यक्ति; सर्वत्र— सभी जगह; सम-दर्शन:—समभाव से देखने वाला।

अनुवाद : वास्तविक योगी समस्त जीवों में मुझको तथा मुझमें समस्त जीवों को देखता है। नि:संदेह स्वरूपसिद्ध व्यक्ति मुझ परमेश्वर को सर्वत्र देखता है।

 

तात्पर्य : कृष्णभावनाभावित योगी पूर्ण दृष्टा होता है क्योंकि वह परब्रह्म कृष्ण को हर प्राणी के हृदय में परमात्मा रूप में स्थित देखता है। अपने परमात्मा रूप में भगवान सबके हृदय में स्थित होते हैं। पूर्णयोगी जानता है कि भगवान नित्यरूप में दिव्य हैं और सब में स्थित होने के कारण भौतिक रूप से प्रभावित नहीं होते। यही भगवान की परम निरपेक्षता है। यद्यपि आत्मा भी प्रत्येक हृदय में विद्यमान है, किन्तु वह एक साथ समस्त हृदयों में (सर्वव्यापी) नहीं है। आत्मा तथा परमात्मा का यही अंतर है। जो वास्तविक रूप से योगाभ्यास करने वाला नहीं है वह इसे स्पष्ट रूप में नहीं देखता। एक कृष्णभावनाभावित व्यक्ति कृष्ण को आस्तिक तथा नास्तिक दोनों में देख सकता है। स्मृति में इसकी पुष्टि इस प्रकार हुई है- आततत्वाच्च मातृत्वाच्च आत्मा हि परमो हरि:। भगवान सभी प्राणियों का स्रोत होने के कारण माता और पालनकर्ता के समान हैं।

जिस प्रकार माता अपने समस्त पुत्रों के प्रति समभाव रखती है उसी प्रकार परम पिता (या माता) भी रखता है। फलस्वरूप परमात्मा प्रत्येक जीव में निवास करता है। बाह्य रूप से भी प्रत्येक जीव भगवान की शक्ति (भगवद् शक्ति) में स्थित है। जैसा कि सातवें अध्याय में बताया जाएगा, भगवान की दो मुख्य शक्तियां हैं- परा तथा अपरा। जीव पराशक्ति का अंश होते हुए भी अपराशक्ति से बद्ध है, जीव सदा ही भगवान की शक्ति में स्थित है। प्रत्येक जीव किसी न किसी प्रकार भगवान में ही स्थित रहता है। योगी समदर्शी है क्योंकि वह देखता है कि सारे जीव अपने-अपने कर्मफल के अनुसार विभिन्न स्थितियों में रह कर भगवान के दास होते हैं। अपराशक्ति में जीव भौतिक इंद्रियों का दास रहता है जबकि पराशक्ति में वह साक्षात परमेश्वर का दास रहता है। इस प्रकार प्रत्येक अवस्था में जीव ईश्वर का दास है। कृष्णाभावनाभावित व्यक्ति में यह समदृष्टि पूर्ण होती है।

‘गीता’ इस बात की पुष्टि करती है कि पूरे ब्रrांड में एक ही ध्वनि ओम या ओंकार के नाम से गूंज रही है। गुरुनानकजी ने भी इसका विस्तार से वर्णन किया है। उनके अनुसार परमात्मा एक है। उसके जैसा कोई और नहीं है। वह हर जगह मौजूद है। वह सब कुछ बनाने वाला है। उसे किसी से कोई डर नहीं है और न ही उसकी किसी से दुश्मनी है। उसकी शक्ल काल रहित है और उस पर समय का प्रभाव नहीं पड़ता।

परमात्मा न तो पैदा होता है और न मरता है। उसे न किसी ने जन्म दिया है और न बनाया है, वह खुद प्रकाशित हुआ है। गुरु की कृपा से परमात्मा हमारे हृदय में बसता है। वेदों और पुराणों के अनुसार हर व्यक्ति के भीतर ईश्वर ही है। जिसने अपनी पांचों इंद्रियों पर विजय प्राप्त कर ली उसे भगवान कहते हैं। वैसे कुछ लोग ईश्वर के अस्तित्व को नकारते हैं। वे कहते हैं कि ईश्वर का होना एक भ्रम या छलावा है। ऐसे लोग तर्क देते हैं कि ईश्वर होता तो वह दिखाई देता।

यजुर्वेद में कहा गया है कि परमेश्वर ऊपर से, नीचे से, बीच से, इधर-उधर से किसी भी तरह किसी की पकड़ या अधीन में नहीं आ सकता है। जब वह पकड़ में ही नहीं आ सकता है तो दिखाई कैसे दे सकता है। दरअसल, लोगों की चिंताएं और महत्वाकांक्षाएं इतनी अधिक होती हैं कि जब वे पूरी नहीं होती हैं तो वे यह मानने लगते हैं कि इसका कारण ईश्वर है, इसलिए वे या तो उसकी सत्ता को चुनौती देने की कोशिश करते हैं या फिर उसकी सत्ता को मानने से ही इंकार करते हैं। किसी ने ठीक ही कहा है कि आपकी महत्वाकांक्षाओं की सूची जितनी लंबी होगी, आपका ईश्वर उतना ही छोटा होगा। इसके विपरीत सच्चाई यह है कि जब हम यह मानते हैं कि ईश्वर है तो हमारे भीतर एक असीम-अनंत ऊर्जा का संचार होता है । ईश्वर को हम अपनी सामान्य आंखों से नहीं, बल्कि अपनी मन की आंखों से खोजें तो वह हमें सभी जगह दिखाई देता है। स्वामी विवेकानंद जी कहते हैं कि ईश्वर ही ईश्वर की उपलब्धि कर सकता है। इस भाव से सबको देखें कि सभी जीवित प्राणी ईश्वर हैं। मनुष्य का अध्ययन करें, मनुष्य ही जीवंत काव्य है। जगत में जितने बुद्ध या महात्मा हुए हैं वे सभी आत्मा की ज्योति से ज्योतिमान रहे हैं। जिस व्यक्ति में प्रेम और करुणा है, ईश्वर उसके भीतर विराजमान है। इसलिए हमें एक-दूसरे से प्रेम करना चाहिए और दूसरों के दुखों को महसूस करना चाहिए।

परमात्मा सर्वज्ञ पर सर्वव्यापी नहीं

औरैया, नगर संवाददाता : सत्तेश्वर मुहाल स्थित प्रजापति ब्रह्माकुमारी ईश्वरी विश्वविद्यालय सभागार में आयोजित कार्यक्रम में ब्रह्माकुमारी कृष्णा बहन ने कहा कि भगवान जिन्हें वास्तविक स्वरूप में न जानते हुए भी हम सभी का सर्व शक्तिमान, सर्वज्ञ एवं सर्व गति, सद्गति, दाता, माता-पिता कहकर बुलाते आये हैं, क्या उन्हें कण-कण में व्याप्त करना उनकी ग्लानि एवं उन्हें गाली देने जैसा नहीं है।

उन्होंने कहा कि परमात्मा सर्व आत्माओं का पिता है। यदि सबके अंदर वही एक सत्ता विराजमान है तो सभी परमात्मा बाप हो जायें तो फिर हमारा आपस में भाई-भाई का नाता ही समाप्त हो जायेगा। धर्मात्मायें, देवात्मायें, पुण्यात्मायें, पापात्मायें अनेक हैं जबकि परमात्मा एक है। परमात्मा यदि सब जगह विद्यमान होता है तो उन्हें ऊपर वाला न कहकर अंदर वाला कहना चाहिए था तथा फिर बुलाने की आवश्यकता ही नहीं पड़ेगी। उन्होंने कहा कि परमात्मा तो धर्म, ग्लानि के समय अवतरित होता है। शास्त्रों के अनुसार उन्हें हर युग में 24 अवतार लेकर आना बताया गया है। उन्होंने कहा कि गीता का सत्य ज्ञान स्वयं परमपिता परमात्मा शिव द्वारा इस कलियुग के अंत में शीघ्र होने वाले महाविनाश के पहले जब पूरी दुनियां कुरुक्षेत्र बन जाती है तब श्रीकृष्ण की आत्मा के 84 वें जन्म के शरीर में दिव्य प्रवेश कराके दिया जाता है। उस शरीर का नाम प्रजापिता ब्रह्मा रखते हैं जिन्हें कोटों में कोई भी पहचान पाते हैं। आखिर वो श्रेष्ठ आत्मा कौन है जिसके शरीर रूपी रथ द्वारा स्वयं परमात्मा इस पतित पुरानी नरक की दुनियां को बदलकर पावन सतयुगी सृष्टि की स्थापना कर 75 वर्षो से कर रहे हैं। इस मौके पर बड़ी संख्या में महिला व पुरुषों ने हिस्सेदारी की।

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