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(भाग : 281) परमात्मा सर्व व्यापक सबके ह्रदय में विराजमान है उन्ही से मिलती निरंतर स्मृति ज्ञान और विस्मृतियां

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(भाग : 281) परमात्मा सर्व व्यापक सबके ह्रदय में विराजमान है उन्ही से मिलती निरंतर स्मृति ज्ञान और विस्मृतियां

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टेकचंद्र सनोडिया शास्त्री: सह-संपादक रिपोर्ट

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सर्वस्य चाहं हृदय सन्निविष्टो मत्तः स्मृतिर्जनमोहनं च |

वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यो वेदांतकृद्वेदविदेव चाहम् || 15

अनुवाद

श्रीमदभागवत गीता भगवान श्रीकृष्णचंद्र कहते हैं कि मैं सर्व व्यापक सबके हृदय में विराजमान हूं और मुझसे ही स्मृति, ज्ञान और विस्मृति आती है। समस्त वेदों के द्वारा मैं ही जाना हूं; वास्तव में मैं वेदांत का संकलनकर्ता हूं और मैं वेदों का ज्ञाता भी हूं।

परमात्मा हर किसी के हृदय में जीव ब्रम्ह परमात्मा के रूप में विराजमान हैं, और उन्हीं से सभी गतिविधियाँ शुरू होती हैं। जीव अपने पिछले जीवन की हर बात भूल जाता है, लेकिन उसे परमेश्वर के निर्देश के अनुसार कार्य करना होता है, जो उसके सभी कार्यों का गवाह है। इसलिए वह अपने पिछले कर्मों के अनुसार ही अपना काम शुरू करता है। उसे आवश्यक ज्ञान प्रदान किया जाता है, और उसे स्मरण दिया जाता है, और वह अपने पिछले जीवन के बारे में भी भूल जाता है। इस प्रकार, भगवान न केवल सर्वव्यापी हैं; वह प्रत्येक व्यक्ति के हृदय में भी स्थित है। वह भिन्न-भिन्न प्रकार के सकाम फल प्रदान करता है। वह न केवल निर्विशेष ब्रह्म, भगवान और स्थानीय परमात्मा के रूप में पूजनीय हैं, बल्कि वेदों के अवतार के रूप में भी पूजनीय हैं। वेद लोगों को सही दिशा देते हैं ताकि वे अपने जीवन को सही ढंग से ढाल सकें और भगवान के पास, घर वापस आ सकें। वेद भगवान, कृष्ण के सर्वोच्च व्यक्तित्व का ज्ञान प्रदान करते हैं, और व्यासदेव वेदांत-सूत्र के संकलनकर्ता हैं। श्रीमद-भागवतम में व्यासदेव द्वारा वेदांत-सूत्र पर की गई टिप्पणी वेदांत-सूत्र की वास्तविक समझ देती है। भगवान इतने पूर्ण हैं कि बद्ध जीव की मुक्ति के लिए वे भोजन के आपूर्तिकर्ता और पचाने वाले हैं, उनकी गतिविधि के साक्षी हैं, वेदों के रूप में ज्ञान के दाता हैं और भगवान श्रीकृष्ण के रूप में परम भगवान हैं। भगवद गीता के शिक्षक. वह बद्ध आत्मा के लिए पूजनीय है। इस प्रकार ईश्वर सर्वगुणसम्पन्न है; ईश्वर सर्व दयालु है.

अन्तःप्रविष्टः शास्ता जनानाम् । जीव अपने वर्तमान शरीर को त्यागते ही भूल जाता है, लेकिन वह परमेश्वर द्वारा आरंभ करके अपना कार्य फिर से शुरू कर देता है। हालाँकि वह भूल जाता है, प्रभु उसे अपना काम फिर से शुरू करने की बुद्धि देते हैं जहाँ उसने अपना अंतिम जीवन समाप्त किया था। अत: जीव न केवल हृदय में स्थित परम भगवान के आदेश के अनुसार इस संसार में आनंद या कष्ट उठाता है, बल्कि उसे उनसे वेदों को समझने का अवसर भी प्राप्त होता है। यदि कोई वैदिक ज्ञान को समझने के लिए गंभीर है, तो कृष्ण आवश्यक बुद्धि देते हैं। वह वैदिक ज्ञान को समझने के लिए क्यों प्रस्तुत करते हैं? क्योंकि एक जीव को व्यक्तिगत रूप से कृष्ण को समझने की आवश्यकता है । वैदिक साहित्य इसकी पुष्टि करता है: योऽसौ सर्वैर वेदैर गयते। चार वेदों, वेदांत-सूत्र और उपनिषदों और पुराणों से शुरू होकर, सभी वैदिक साहित्य में, सर्वोच्च भगवान की महिमा का जश्न मनाया जाता है। वैदिक अनुष्ठान करने, वैदिक दर्शन पर चर्चा करने और भक्तिपूर्वक भगवान की पूजा करने से वह प्राप्त हो जाता है। इसलिए वेदों का उद्देश्य कृष्ण को समझना है। वेद हमें कृष्ण को समझने और समझने की प्रक्रिया की दिशा देते हैं। अंतिम लक्ष्य भगवान का परम व्यक्तित्व है। वेदांत-सूत्र निम्नलिखित शब्दों में इसकी पुष्टि करता है: तत् तु समन्वयात्। कोई व्यक्ति वैदिक साहित्य को समझकर पूर्णता प्राप्त कर सकता है, और कोई व्यक्ति विभिन्न प्रक्रियाओं को निष्पादित करके भगवान के परम व्यक्तित्व के साथ अपने संबंध को समझ सकता है। इस प्रकार व्यक्ति उसके पास पहुंच सकता है और अंत में सर्वोच्च लक्ष्य प्राप्त कर सकता है, जो भगवान के अलावा और कोई नहीं है। हालाँकि, इस श्लोक में वेदों के उद्देश्य, वेदों की समझ और वेदों के लक्ष्य को स्पष्ट रूप से परिभाषित किया गया है।

क्या आप जानते हैं कि पूर्ण परमात्मा कौन है?

हमारे शास्त्रों के अनुसार पूर्ण परमात्मा कबीर साहेब जी ही है

पूर्ण परमात्मा कौन है? उसे कैसे प्राप्त किया जा सकता है? और उनकी भक्ति करने का सर्वश्रेष्ठ तरीक़ा क्या है ?

जिन-जिन पुण्यात्माओं ने परमात्मा को प्राप्त किया उन्होंने बताया कि कुल का मालिक एक है। वह मानव सदृश तेजोमय शरीर युक्त है। जिसके एक रोम कूप का प्रकाश करोड़ सूर्य तथा करोड़ चन्द्रमाओं की रोशनी से भी अधिक है। उसी ने नाना रूप बनाए हैं। परमेश्वर का वास्तविक नाम अपनी-अपनी भाषाओं में कविर्देव (वेदों में संस्कृत भाषा में) तथा हक्का कबीर (श्री गुरु ग्रन्थ साहेब में पृष्ठ नं. 721

पूर्ण परमात्मा कौन है? उसे कैसे प्राप्त किया जा सकता है? और उनकी भक्ति करने का सर्वश्रेष्ठ तरीक़ा क्या है ?

देखिए परमात्मा के बारे में पिछले हजारों सालों में बहुत बताया जा चुका है। बहुत ही गुरुओं ने अनंत लेख लिखे हैं और बहुत ही ग्रंथों में परमात्मा की चर्चा व व्याख्या है। परंतु आज भी यही सवाल मनुष्य के सामने खड़ा होता है कि आखिर परमात्मा है क्या अथवा कौन।

तो पहले तो बात यह समझ आती है कि शब्दों में यह व्यक्त नहीं किया जा सकता कि परमात्मा कौन है, केवल इशारा किया जा सकता है। सत्य में पता लगाने के लिए कि परमात्मा है कौन, श्रम करना पड़ता है,‌साधना करनी पड़ती है। जब तक साधना नहीं करेंगे, तब तक इस सवाल का जवाब मिल नहीं सकता।

अगर कोई आपको यह बता भी दे कि परमात्मा कौन है, आप तक उत्तर पहुंचेगा नहीं। आप में ग्रहण करने की योग्यता होनी चाहिए। फिलहाल तो यही बताया जा सकता है कि परमात्मा क्या नहीं है। तो उसके लिए श्री आदि शंकराचार्य जी द्वारा रचित और गुरुमां आनंदमूर्ति द्वारा गाया गया निर्वाण षटकम् सुनिए जिसका लिंक मैंने कमेंट-टिप्पणी में सांझा कर दिया है।

दूसरी बात,यह जानना जरूरी है कि परमात्मा को प्राप्त नहीं किया जाता, परमात्मा को उपलब्ध हुआ जाता है। व्यक्ति मात्र परमात्मा को पा नहीं सकता क्योंकि व्यक्ति बहुत छोटा है और परमात्मा बहुत बड़ा।

परमात्मा ही स्वयं अपना परिचय देते हैं अथवा यह कह लें कि व्यक्ति परमात्मा में लीन हो जाता है – परमात्मा ही हो जाता है। यह कार्य कारण के सिद्धांत के परे की बात है। यह कृपा की बात है। श्रम तो करना ही पड़ेगा, साधना तो करनी ही पड़ेगी और फिर भी यह परमात्मा की कृपा पर ही निर्भर है कि वह जीवन में मूल रूप में उतरेंगे या नहीं।

अब बात करते हैं कि “परमात्मा कौन है” इसका उत्तर स्वयं कैसे ढूंढ लिया जाए। उत्तर ढूंढने के लिए आपको अपने ही भीतर जाना होगा। अभी ऊर्जा इंद्रियों से बाहर जाती है, उसी ऊर्जा को यू टर्न कर वापस मोड़ना होगा ताकि चेतना स्वयं को ही पहचानना शुरू कर सके।

जैसे-जैसे और जितने अपने ही भीतर गहरे उतरते जाएंगे, वैसे वैसे परमात्मा के करीब होते जाएंगे। फिर एक क्षण आएगा जब व्यक्ति जिसने अपने भीतर उतरने की यात्रा शुरू की थी, वह परम चैतन्य के रूप मेें स्वयं को पाएगा – शरीर, मन और चित् से परे। यही परम चैतन्य परमात्मा है, यही पूर्ण है, यही एक है, मूल स्वरूप में यही आप स्वयं हो। इस अवस्था को चैतन्य समाधि भी कहा जाता है।

बहुत गुरूओं ने समाधि पर ज़ोर दिया है। जैसे भगवान बुद्ध सम्यक समाधि की बात करते हैं, महर्षी पतंजलि अष्टांग मार्ग में आखिरी सीढ़ी समाधि को कहते हैं इत्यादि। निर्विकल्प समाधि वो अवस्था है जहां मनुष्य की आंखों पर से मन का परदा हटता है और एकत्व के दर्शन होते हैं।

क्योंकि बात मन से परे की है, तो मन को बताने के लिए नेति नेति (न यह न वह) का उपयोग होता है इसलिए परमात्मा को निराकार, निर्गुण, निर्लेप, निर्भय व अन्य नामों से जाना जाता है।

भीतर उतरने के तो बहुत उपाय हैं लेकिन जो भी उपाय कर लें, अंत में व्यक्ति समाधि की अवस्था में ही पहुंचता है जो कि ध्यान का शिखर है।

आपने भक्ति मार्ग के बारे में पूछा है तो भक्ति मार्ग की ही बात करेंगे। भक्ति एक बहुत ही सुंदर मार्ग है। नारद मुनि कहते हैं कि भक्ति प्रारंभ में, मध्य में और अंत में हर चरण में मीठी है।

कबीर साहब कहते हैं पोथी पढ़ पढ़ जग मुआ पंडित भया न कोय ढाई आखर प्रेम के पढ़े सो पंडित होय।

ओशो कहते हैं प्रेम परमात्मा है।

गुरु गोबिंद सिंह कहते हैं जिन प्रेम कियो तिन ही प्रभु पायो।

सच्चे अर्थों में प्रेम में, अनन्य भक्ति में परमात्मा की झलक बहुत आसान है। समर्पण स्वत: हो जाता है। भक्ति में भक्त और ईश्ट दोनों ही विलीन हो जाते हैं और केवल भक्ति ही बचती है। यह भक्ति परमात्मा ही है।

तो ऐसे तो बहुत ही कम या न के बराबर व्यक्ति हुए हैं जिन्होंने भक्ति ही निराकार की, ब्रह्म की ही कर ली, परम चैतन्य की ही कर ली। गुरु नानक का नाम मन में आता है। किसी माध्यम की जरूरत ही न पड़ी।

हम मनुष्यों को अक्सर भक्ति पहले साकार रूप से शुरू करनी पड़ती है क्योंकि जो है ही निराकार, जो है ही निर्गुण, जिसे छू नहीं सकते, महसूस नहीं कर सकते, उस से प्रेम कैसे कर ले? इसीलिए भक्ति के माध्यम ढूंढने पड़ते है। तो भारत की संस्कृति में तो बहुत ही माध्यम बनाए गए हैं।

 

भक्ति में कोई किसी मूर्ति को माध्यम बनाता है, कोई किसी चित्र को, कोई प्रकृति को, कोई किसी पत्थर को ही माध्यम बना देता है और कोई किसी गुरु को माध्यम बना लेता है। अगर किसी का प्रेम अपने प्रेमी के लिए बहुत ही उच्च कोटि का हो तो वह प्रेमी को ही ईश्ट बना लेता या लेती है जैसे स्वयं पार्वती जी ने भगवान शिव को अपना इष्ट बना लिया।यह चुनाव तब आपको करना है कि आप का समर्पण किसके प्रति सहज है। जिसके प्रति समर्पण सहज है, उसे ईश्ट रूप में देखना काफी सरल हो जाता है।

इसमें मनुष्य के लिए सब से उच्च माध्यम गुरु ही हैं।

कबीर साहब कहते हैं गुरु गोविंद दोनों खड़े काके लागू पाय ।बलिहारी गुरु आपने जिन गोविंद दियो बताए।।

इसीलिए भारतीय संस्कृति सिखाती है गुरुर ब्रह्मा गुरुर विष्णु गुरुर देवो महेश्वरा। गुरु: साक्षात् परम ब्रम्ह तस्मै श्री गुर्वे नमः।।

अगर गुरु ब्रह्म ज्ञानी है तो वह परमात्मा में ही लीन है और जो परमात्मा में लीन है वह परमात्मा का ही प्रत्यक्ष रूप है। तुम्हें तो कहूंगा कि एक गुरु खोजो। उससे भी ज्यादा, स्वयं को एक ब्रह्म ज्ञानी गुरु के शिष्य होने के लिए योग्यता पर काम करो। पात्रता बहुत ही कम लोगों में होती है और पात्रता का एक ही मूल है – कितनी प्यास है? कितनी तड़प है? क्या सत्य में परमात्मा को पूरे दिल से पाना चाहते हो? प्यास ही एक सत्गुरु से मिलवाती है।

क्या इस कदर पाना चाहते हो कि अगर खुद भी मिट जाओ तो उसके लिए पूर्ण रूप से तत्पर हो? जो मिटने के लिए तैयार है, वही अनन्य भक्ति के लिए भी तैयार है। यहां तक कि अनन्य भक्ति स्वयं उसके जीवन में उतरती है। किसी ना किसी रूप में गुरु उसे प्राप्त हो ही जाएंगे। अगर गुरु है, और भक्ति है तो फिर परमात्मा से दूरी कैसी?

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