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(भाग:184) मनुष्य को अध:पतन की ओर ले जाने वाले बुरे कर्मों की विस्तारपूर्वक व्याख्या की थी भगवान बुद्ध ने

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भाग:184) मनुष्य को अध:पतन की ओर ले जाने वाले बुरे कर्मों की विस्तारपूर्वक व्याख्या की थी भगवान बुद्ध ने

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टेकचंद्र सनोडिया शास्त्री: सह-संपादक रिपोर्ट

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बौधगया। धर्म कीर्ति आज से लगभग ढाई हजार वर्ष पूर्व भगवान बुद्ध ने बुरे कर्मों की विस्तारपूर्वक व्याख्या की थी। एक समय बुद्ध श्रावस्ती में सेठ अनाथ पिंडिक द्वारा निर्मित जेतवनाराम मठ में वर्षावास कर रहे थे। एक रात एक देवता (श्रेष्ठ व्यक्ति) अपने प्रकाश से पूरे जेतवन को प्रकाशित करता हुआ वहां आया। भगवान का अभिवादन करनेके बाद उसने पूछा, हे गौतम, मनुष्य की अवनति (पतन) के कारण क्या होते हैं? यह सुनकर बुद्ध ने उत्तर दिया, हे देव! जिस प्रकार उन्नतिगामी पुरुष को आसानी से पहचाना जा सकता है, उसी प्रकार अवनतिगामी (पतन की ओर जाने वाले) मनुष्य को भी आसानी से जाना जा सकता है। धर्म पर चलने वाले मनुष्य की हमेशा उन्नति होती है और धर्म से द्वेष व घृणा करने वाले की अवनति होती है। जिस मनुष्य को दुर्जन व दुष्ट प्रिय होते हैं, जो सज्जन पुरुषों से घृणा व द्वेष करता है और बुरे व पाखंडियों के मार्ग को पसंद करता है, वह उसकी अवनति का कारण होता है।अपनी बात को जारी रखते हुए बुद्ध ने आगे कहा, हे देव! अधिक सोने वाला, भीड़-भाड़ व मेले-तमाशे में मौज-मस्ती लेने वाला, परिश्रम न करने वाला, आलसी और क्रोध करने वाला हमेशा पतन को प्राप्त होता है। जो समर्थ व संपन्न हो कर भी अपने बूढ़े माता-पिता की सेवा और उनका पालन-पोषण नहीं करता, उसकी अवनति होती है। जो श्रेष्ठ जनों, श्रमणों व अन्य याचकों को झूठ बोलकर भिक्षा या सहायता देने से मना करता है, उसकी अवनति होती है। जो धनवान और समर्थ हो कर भी अकेला ही स्वादिष्ट भोजन करता है और भूखे व असहायों को भोजन नहीं कराता, उसकी अवनति होती है। जो मनुष्य वर्ण, जाति, गोत्र व धन-दौलत का अहंकार व घमंड करता है और समाज में जाति-पांति के कारण अन्य लोगों का अपमान करता है, उसकी अवनति होती है।बुद्ध ने कहा, जो मनुष्य पराई स्त्रियों के पीछे पड़ा रहता है, वह लंपट, व्यभिचारी, बलात्कारी, शराबी व जुआरी होता है व कमाए हुए धन को बर्बाद करता है, यह सब उसकी अवनति का कारण होते हैं। जो व्यक्ति अपनी पत्नी से संतुष्ट नहीं रहता और वेश्या गमन करता है, यह उसकी अवनति व नैतिक पतन का कारण होता है। जो वृद्ध व्यक्ति बुढ़ापे में किसी नवयुवती से शादी करके ले आता है, तो वह क्रोध, ईर्ष्या द्वेष, जलनखोरी, चोरी, चुगलखोरी,चापलूसखोरी, झूठ, छलकपट, विश्वासघात,और भ्रष्टाचार के कारण भली प्रकार सो नहीं पाता, इससे उसकी अवनति होती है।अंत में भगवान बुद्ध ने कहा, जब कोई व्यक्ति किसी लालची अथवा धन को बर्बाद करने वाली स्त्री या पुरुष को अपनी संपत्ति का मालिक बना देता है और वह उस संपत्ति को बर्बाद कर देता है, तो इससे भी उस मनुष्य की अवनति होती है। अच्छे कुल में उत्पन्न व्यक्ति जब कम संपत्ति वाला होता है, लालची होता है या राजा बनने की तीव्र इच्छा रखता है, तो वह उसकी अवनति का कारण बनता है।बुद्ध ने संसार में मनुष्य की अवनति के यही कारण बताए हैं। बुद्धिमान (आर्य) लोग इन कारणों को जानकर इनसे दूर ही रहते हैं। उस अवस्था में मनुष्य का जीवन सुखपूर्वक आगे बढ़ता है। ऐसे मनुष्य की प्रगति होती है। आज हमारे समाज में अमंगल (अनैतिक व बुरे) कर्मों की बाढ़ आ गई है। आधुनिक युग में मनुष्य विज्ञान की उन्नति के कारण भौतिक क्षेत्र में भले ही प्रगति व विकास कर रहा हो, लेकिन आध्यात्मिक एवं नैतिक क्षेत्र में वह अवनति की ओर बढ़ता हुआ दिखाई दे रहा है। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि विज्ञान की चकाचौंध में वह मंगल और अमंगल कर्मों में फर्क नहीं कर पा रहा। इसके फलस्वरूप आज समाज में नशाखोरी, भ्रष्टाचार, व्यभिचार, हिंसा एवं अन्याय जैसे अमंगल (बुरे) कर्मों में वृद्धि हो रही है। उनका जंगल की आग की तरह तेजी से विस्तार भी हो रहा है। इन अमंगल, अशुभ, अनैतिक व बुरे कर्मों के कारण मनुष्य व समाज अध:पतन की ओर बढ़ रहा है।
इंसान खुद ही अपने पतन का कारण बनता है ।

मानव के पतन क पीछे, मनुष्य के कर्म होते है, अगर वह अच्छे कर्म करता है तो वह ऊपर उठता है अगर वह गलत कर्म करता है तो वह नीचे, गिरता है. सारा खेल ही कर्मो का है, अज्ज मानव को होश ही नही है वो क्या करे जा रहा है, इसलिए दुनिया एक दूसरी तरफ़ जा रही है! या पतन की ओर जा रही है

मानव पतन के कौन से कारण है?

अहंकार और अशिक्षित होना , अच्छे संस्कारों की कमी और क्रोध, भय , द्वेष, लोभ और मोह के भावनाओं को नियंत्रण में ना रखना, शराब , ड्रग का नशा करनाऔर जुआ खेलना और अपने को सर्वश्रेष्ठ, शक्तिशाली और धन के अहंकार में रहते हुए, दूसरे को सताना और मारना, मानव पतन के मुख्य कारण हैं।
जब मनुष्य अपने मन में आए गलत विषय से अपना संबंध बनाता है, तब उसकी उसमें आसक्ति हो जाती है। इससे उसमें उसकी कामना पैदा होती है। एक बार ऐसी कामना पूरी हुई कि फिर इनकी अंतहीन झड़ी लग जाती है। ये पूरी नहीं होतीं, इससे हम क्रोधित होते हैं, हमारी ज्ञानशक्ति नष्ट हो जाती है, और हम पतनोन्मुख हो जाते हैं।
जब मनुष्य अपने मन में आए गलत विषय से अपना संबंध बनाता है, तब उसकी उसमें आसक्ति हो जाती है। इससे उसमें उसकी कामना पैदा होती है। एक बार ऐसी कामना पूरी हुई कि फिर इनकी अंतहीन झड़ी लग जाती है। ये पूरी नहीं होतीं, इससे हम क्रोधित होते हैं, हमारी ज्ञानशक्ति नष्ट हो जाती है, और हम पतनोन्मुख हो जाते हैं। अर्था

आपको अपने सवाल में संशोधन की आवश्यकता है।

मानव का पतन नहीं हुआ है। यदि मानव का पतन होता तो वह कभी आसमान में नहीं उड सकता था। वह तब केवल कथा-कहानियों तक ही सीमित रहा होता और उसी में उड रहा होता। ऐसा कर दिखाना उसके उत्थान का प्रतीक है। वास्तव में पतन भारतीयों का हुआ है। भारतीय कभी हीरा थे जो दूसरों को खूब आकर्षित किए हुए थे। हीरे की एक विशेषता होती है। जब तक वह अकेला और खूब बडा होता है, बेहद कीमती होता है। टूटकर बिखरते ही उसकी कीमत जाती रहती है।

बस यही हाल भारतीयों का हुआ है। वह टूटकर क्या बिखरा? आज संभाले नहीं संभल पा रहा है। ढेरों धर्मों-जातियों में विभाजन ही उसका वास्तविक पतन है जिसमें उसने गुलामी तक झेली है।

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