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धार्मिक

जानिए! उप महाद्वीप में वैदिक सनातन-हिन्दू धर्म संस्कृति का महत्व और इतिहास

वैैदिक-सनातन धर्म संस्कृतिक जो वैदिक धर्म के वैकल्पिक नाम से जाना जाता है।वैदिक काल में भारतीय उपमहाद्वीप के धर्म के लिये ‘सनातन धर्म’ नाम मिलता है। ‘सनातन’ का अर्थ है – शाश्वत या ‘हमेशा बना रहने वाला’, अर्थात् जिसका न आदि है न अन्त। सनातन धर्म मूलत: भारतीय धर्म है, जो किसी ज़माने में पूरे वृहत्तर भारत (भारतीय उपमहाद्वीप) तक …

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(भाग-31) श्रीमद्-भगवत गीता के अध्ययन पठन पाठन और चितन से महापुण्य की प्राप्ती संभव है

गीता के मत्रों में मोक्षदा एकादशी के नाम से जाना जाता है क्योंकि इस एकादशी के दिन व्रत रखकर भगवान विष्णु की पूजा एवं दान करने से व्यक्ति मोक्ष का अधिकारी बनता है। इस एकादशी का विशेष महत्व इसलिए है क्योंकि इसी दिन भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन का मोह भंग करने के लिए मोक्ष प्रदायिनी श्रीमद्भगवद्गीता का अपदेश दिया …

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(भाग-30) श्रीमद्-भगवत में भगवान श्रीकृष्ण ने जप तप और दान की बड़ी सुंदर व्याख्या की है

श्रीमद-भगवद गीता मे भगवान कहते हैं कि जो भोजन उम्र को बढ़ाने वाले, मन, बुद्धि को शुद्ध करने वाले, शरीर को स्वस्थ कर शक्ति देने वाले, सुख और संतोष को प्रदान करने वाले, रसयुक्त और मन को स्थिर रखने वाले तथा हृदय को भाने वाले होते हैं, ऐसे भोजन सतोगुणी मनुष्यों को प्रिय होते हैं। इस दुनिया में सिर्फ शहद …

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(भाग-29) ग्रहस्थ आश्रम मे रहते हुए सत्कर्मयोग के द्धारा परम्-सिद्धी प्राप्त करना श्रेयस्ठतम है !

प्रश्न‒गृहस्थ का खास धर्म क्या है ? उत्तर‒ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास‒इन चारों आश्रमों की सेवा करना गृहस्थ का परम् धर्म है; क्योंकि गृहस्थ ही सबका माँ-बाप है, पालक है, संरक्षक है अर्थात् गृहस्थ से ही ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यासी उत्पन्न होते हैं और पालित एवं संरक्षित होते हैं श्री भगवानुवाच इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम्। विवस्वान् मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवत्।।4.1।। …

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(भाग-28) श्रीमद्-भगवत गीता मे होता है साक्षात गुरु-गंगा एवं भगवान का संयुक्त मिलन

भगवान श्रीकृष्ण साक्षात तीनों लोकों के जगतगुरु हैं भगवान श्रीकृष्णचंद्र के मुखारविंद से निकली अमृतरुपी गंगा-गुरु है। भगवद गीता में भगवान कृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि जीवन में सबसे बड़ा योग कर्म योग है। इस बंधन से कोई मुक्त नहीं हो सकता है अपितु भगवान भी कर्म बंधन के पाश में बंधे हैं। योग की उत्पत्ति अति प्राचीन है। …

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(भाग-27) श्रीमद भगवत गीता में आत्म साक्षात्कार का परमलक्ष्य भगवान श्रीकृष्ण आनन्द कंद श्रीकृष्ण चंद्र है

(भाग:27) श्रीमद् भगवत गीता में आत्म साक्षात्कार का परमलक्ष्य भगवान आनन्द कंद श्री कृष्णचंद्र हैं ✍️टेकचंद्र सनोडिया शास्त्री:की रिपोर्ट श्रीमद भगवत गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते है कि समस्त यज्ञ और तपों को भोगने वाला सम्पूर्ण लोकों का महेश्वर तथा सभी प्राणियों को सदा अभय देने वाला, कृपा करने वाला स्वार्थ रहित मित्र हूँ। जो आत्म स्थित मुझे इस प्रकार …

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(भाग-26) श्रीमद-गीता में परमात्म श्रीकृष्ण चंद्र के प्रति पूर्णता:शरणागति हो जाना ही सन्यास है

भगवद्गीता का अंतिम अध्याय सबसे बड़ा है और इसमें कई विषयों को सम्मिलित किया गया है। अर्जुन संस्कृत में प्रायः प्रयुक्त होने वाले दो शब्दों संन्यास और त्याग के संबंध में प्रश्न पूछने के साथ संन्यास के विषय पर चर्चा प्रारम्भ करता है। दोनों शब्द एक ही मूल धातु के हैं जिसका अर्थ ‘परित्याग करना’ है। संन्यासी वह है जो …

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(भाग-25) श्रीमद भगवत गीता मे मनुष्य का परम् उद्देश्य सन्यास के द्धारा मोक्ष को प्राप्त होना है!

गीता मे संन्यासी वह है जो गृहस्थ जीवन में भाग नहीं लेता और समाज को त्याग कर साधना का अभ्यास करता है। त्यागी वह है जो कर्म में संलग्न रहता है लेकिन कर्म-फल का भोग करने की इच्छा का त्याग करता है। (यही गीता की वाणी का मुख्य अभिप्राय है) श्रीकृष्ण दूसरे प्रकार के त्याग की संतुति करते हैं। भारतीय …

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(भाग-24)ध्यानयोग के बिना मनुष्य सुख:द शांति की अनुुभूति नही कर सकता?

गीता में ध्यानं नाम शब्दादिभ्यो विषयेभ्यः श्रोत्रादीनि करणानि मनसि उपसंहृत्य? मनश्च प्रत्यक्चेतयितरि? एकाग्रतया यत् चिन्तनं तत् ध्यानम् तथा? ध्यायतीव बकः? ध्यायतीव पृथिवी? ध्यायन्तीव पर्वताः (छा0 उ0 7।6।1) इति उपमोपादानात्। तैलधारावत् संततः अविच्छिन्नप्रत्ययो ध्यानम् तेन ध्यानेन आत्मनि बुद्धौ पश्यन्ति आत्मानं प्रत्यक्चेतनम् आत्मना स्वेनैव प्रत्यक्चेतनेन ध्यानसंस्कृतेन अन्तःकरणेन केचित् योगिनः। अन्ये सांख्येन योगेन? सांख्यं नाम इमे सत्त्वरजस्तमांसि गुणाः मया दृश्या अहं तेभ्योऽन्यः तद्व्यापारसाक्षिभूतः …

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(भाग-23)श्रीमद भगवत गीता में सिद्ध पुरुष अपने ध्यान के द्धारा सर्वत्र परमात्म दर्शन करता है

अर्थात: ध्यानेन? ध्यानं नाम शब्दादिभ्यो विषयेभ्यः श्रोत्रादीनि करणानि मनसि उपसंहृत्य? मनश्च प्रत्यक्चेतयितरि? एकाग्रतया यत् चिन्तनं तत् ध्यानम् तथा? ध्यायतीव बकः? ध्यायतीव पृथिवी? ध्यायन्तीव पर्वताः (छा0 उ0 7।6।1) इति उपमोपादानात्। तैलधारावत् संततः अविच्छिन्नप्रत्ययो ध्यानम् तेन ध्यानेन आत्मनि बुद्धौ पश्यन्ति आत्मानं प्रत्यक्चेतनम् आत्मना स्वेनैव प्रत्यक्चेतनेन ध्यानसंस्कृतेन अन्तःकरणेन केचित् योगिनः। अन्ये सांख्येन योगेन? सांख्यं नाम इमे सत्त्वरजस्तमांसि गुणाः मया दृश्या अहं तेभ्योऽन्यः तद्व्यापारसाक्षिभूतः …

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