समर्थांनी ‘सुंदरकांड’ व ‘युद्धकांड’ या दोन कांडांवरच आपल्या रामायणाची उभारणी केली आहे. याचे बीज समर्थांच्या हनुमानभक्तीत आहे. या दोन कांडांमध्ये मारुतीचा पराक्रम व राम-रावण युद्ध यांचेच वर्णन आहे. महाराष्ट्रातील तरुणांपुढे शक्ती, युक्ती व भक्ती या गुणत्रयाचा पुतळा उभा करावा आणि मुख्यत: शक्तिसंपादनाकडे, म्हणजेच बलोपासनेकडे त्यांची प्रवृत्ती व्हावी, हाच समर्थांचा हेतू असावा. मारुतीचे सगळे बळ त्याच्या शेपटीत होते. लंकेमध्ये त्याच्या ‘लांगुलाने’ …
Read More »(भाग- 22) श्रीमद्-भगवत गीता एक अदभुत ग्रन्थ एवं वास्तविक दिव्य कल्पतरु है
श्रीमद्-मदभगवत गीता यह अद्भुत ग्रन्थ और वास्तविक दिव्य कल्पतरु यह हर किसी को उसकी विशेष आवश्यकता के अनुसार सब कुछ प्रदान करने वाली है। इतिहासकार इसमें उस क्षण को चिह्नित करने वाला एक यादगार दस्तावेज स्थापित करेगा जब भूमि से धर्म की समाप्ति और अधर्म के युग के आगमन के साथ हिंदू समाज में पतन शुरू हो गया था। दार्शनिक …
Read More »(भाग-21) वैराग्य का अर्थ,संसार की तरफ पीठ करके स्वयं के घर की ओर वापस होना!
श्रीमद्-भगवद गीता के अनुसार वैराग्य का वास्तविक अर्थ क्या है? राग है संसार की यात्रा का मार्ग, संसार में यात्रा का मार्ग। वैराग्य है संसार की तरफ पीठ करके स्वयं के घर की ओर वापसी। राग यदि सुबह है, जब पक्षी घोंसलों को छोड़कर बाहर की यात्रा पर निकल जाते हैं, तो वैराग्य सांझ है, जब पक्षी अपने नीड़ में …
Read More »(भाग-20)ब्रम्ह-जीवात्मा और परमात्मा के बीच के संबंध को ही भक्ति योग कहा जाता है!
श्रीमदभगवत गीता मे ब्रम्ह-जीवात्मा और परमात्मा के बीच संबंध को ही भक्ति योग कहा जाता है। आमतौर पर कई लोगों द्वारा समझा जाता है कि योग का अर्थ ध्यान और भौतिक मुद्राओं का पालन करना है। लेकिन यह श्रीमद्भगवद्गीता में इससे परे वर्णित है, जो विभिन्न प्रक्रियाओं पर वर्णन करता है जिसमें शाश्वत शांति के लिए आध्यात्मिकता के महत्व सहित, …
Read More »(भाग-19) गीता का उद्देश्य ही आत्मा-परम,पिता-परमात्मा और सृष्टि विधान ज्ञान को स्पष्ट करना है
श्रीमद्भागवत गीता भारत के सभी प्राचीन योग और ज्ञान का निचोड़ और समन्वयक ग्रन्थ है। गीता का उद्देश्य ही परमात्मा के ज्ञान, आत्मा के ज्ञान और सृष्टि विधान के ज्ञान को स्पष्ट करना है। गीता वास्तव में चरित्र निर्माण का सबसे बड़ा और उत्तम शास्त्र है। इसके माध्यम से भगवान ने कहा है कि चरित्र कमल पुष्प समान संसार में …
Read More »(भाग-18) संसारिक कर्म और जन्म-मृत्यु के बंधन से मोक्ष के रास्ते दिखाती है श्रीमद् भगवत गीता!
श्रीमद् भगवत गीता के अनुसार योग का मतलब है “अप्राप्त वस्तुओं की प्राप्ति” तो उस हिसाब से यदि आप कर्म से कुछ प्राप्त करते हो तो वो होता है कर्मयोग, यदि आप भक्ति से कुछ प्राप्त करते हो तो वो होता है भक्तियोग और यदि आप ज्ञान से कुछ प्राप्त करते हो तो वो होता है ज्ञानयोग वैदिक सनातन धार्मिक …
Read More »(भाग-17) कर्मयोग का अनुकरण से ही संसार का निर्माण निर्देशन और प्रबंधन संभव है!
श्रीमद् भगवत गीता मे कर्म योग के अभ्यास से ही एकता की अद्वैत अनुभूति होती है। इसके बिना स्वयं की एकता की वेदान्तिक अनुभूति की कोई आशा नहीं है। “जनक ने कर्म से पूर्णता प्राप्त की।”-गीता, अध्याय। III, श्लोक 20. संसार के साधारण मनुष्य का हृदय स्वार्थ, ईर्ष्या, पूर्वाग्रह, घृणा और अभिमान के कारण बहुत छोटा संकुचित होता है। स्वार्थ, …
Read More »(भाग-16) पृथ्वी पर अधर्म और अन्याय बढता है तब अधर्मियों का नाश करने भगवान अवतरित होते है
श्रीमद् भगवत गीता मे भगवान श्री कृष्णचंद्र ने ये ज्ञान सूर्य को बताया था, और वो बताते है कि ये ज्ञान बहुत ही गुप्त है। ये ज्ञान करोड़ो वर्ष पहले सूर्य को दिया था और “समय के साथ अधर्म के बढ़ते” हुए ये ज्ञान विलुप्त हो गया। ये ज्ञान बहुत ही उत्तम रहस्य है अर्थात गुप्त रखने योग्य विषय है। …
Read More »जाणून घ्या…विठ्ठल देवतेचा इतिहास
आज आषाढी एकादशी. विठ्ठल नामघोषात अवघा महाराष्ट्र दुमदुमून जातो. विठ्ठल देवतेच्या आणि भक्तांच्या अनेक कथा प्रसिद्ध आहेत. परंतु, विठ्ठल देवतेचे मूळ स्वरूप कोणते आहे, याविषयी कमी चिकित्सा होते. सर्वांची प्रिय अशी विठूमाऊली असली, तरी विठ्ठल हे नामकरण कसे झाले, वैष्णव, शैव आणि बौद्ध संप्रदायाचा विठ्ठलाशी कसा संबंध आहे, विठ्ठल देवतेच्या उत्पत्ती कथा, पंढरपूरची व्युत्पत्ती हे जाणून घेणे माहितीपूर्ण ठरेल. कथा …
Read More »(भाग-15) निष्काम कर्म सिद्धांत पर जीवन को चरितार्थ करने वाला मनुष्य साक्षात देवता के तुल्य माना गया है
श्री मद्भ भगवद गीता मे भगवान श्रीकृष्ण चंद्र ने कहा है कि निष्काम कर्म सिद्धांत पर जीवन को चरितार्थ करने वाला मनुष्य साक्षात देवता के तुल्य माना गया है इसलिए हमारा अधिकार केवल कार्य या कार्रवाई करने के लिए है। न कि उसके परिणामों पर, चाहे वह अच्छा हो या बुरा। हमारे कर्म, हमारी इच्छाएँ “इच्छारहित” होनी चाहिए, हमें …
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