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(भाग:274) पतंजलि ऋषि के अनुसार प्रकृति-निसर्ग परमात्म ने मनुष्य को निम्न 5 प्रकार के क्लेश दिए हैं

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भाग:274) पतंजलि ऋषि के अनुसार प्रकृति-निसर्ग परमात्म ने मनुष्य को निम्न 5 प्रकार के क्लेश दिए हैं

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टेकचंद्र सनोडिया शास्त्री: सह-संपादक रिपोर्ट

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पतंजलि ऋषि के कथनानुसार निसर्ग-प्रकृति परमात्मा ने मनुष्य को 5 प्रकार के निम्नानुसार क्लेश दिए हैं? क्लेश का मतलब है : दुक्ख, कष्ट ; वेदना, कष्ट पूर्ण मानसिक स्थिति, मनोव्यथा। उग्र या बहुत कष्टदायक पीड़ा विशेषतः हार्दिक या मानसिक पीड़ा मेरे हृदय की वेदना कोई नहीं समझता । योग शास्त्रानुसार क्लेश के पाँच भेद हैं-अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश

 

निसर्ग -प्रकृति ने यह पांच क्लेश हर शरीर के साथ दिए हैं। अब प्रश्न यह है कि इनकी परत को कितना क्षीण किया जा सकता है और यह कितनी मोटी बनी रह सकती है। यही तुम्हें जीवन में परिष्कृत या अपरिष्कृत बनाता है।ढ

 

ये क्लेश चार अवस्थाओं में हो सकते हैं :-

 

प्रसुप्तावस्था

में ये दुःख सुषुप्त अथवा निष्क्रिय अवस्था में हो सकते हैं।

तनु:

अर्थात वो बहुत अल्पशक्ति की अवस्था में रह गयी हैं, इतनी कम कि जैसे वो हो ही नहीं।

प्रच्छन्न

जिसमें एक क्लेश तो बहुत प्रबल होता है और बाकी चार उसके पृष्ठभूमि में चले जाते हैं। जब राग बहुत अधिक होता है तब द्वेष, भय और बाकी सब कहीं उसके पीछे ही छुप जाता है।

उदार

अर्थात जिसमें सभी क्लेश प्रचुरता से हों, प्रबल हों। तुम पूरे समाज और संसार में यही देख सकते हो, ऐसे लोग जो कोई भी अभ्यास नहीं कर रहे होते हैं, उनके जीवन में सभी क्लेश और दुःख भरपूर होते हैं। महृषि पतंजलि की बड़ी सज्जनता है कि वह क्लेशों को भी उदार कह रहे हैं क्योंकि दुखी लोगों के जीवन में क्लेशों की कोई कमी नहीं होती। सभी क्लेशों के प्रबल होने की अवस्था ही उदार है।

साधना इन पांच क्लेशों को महीन से महीन करती है। हो सकता है कि आध्यात्मिक पथ पर आने से पहले भी आप क्रोधित होते हों और अब उसके बाद भी क्रोध आता हो, परन्तु उस क्रोध की गुणवत्ता बहुत बदल जाती है, वह क्षीण हो कर तनु हो जाती है, मन का पर्दा अधिक पतला और झीना हो जाता है। प्रछन्न, अर्थात जिसमें कोई एक क्लेश प्रबल हो और शेष चार पृष्ठभूमि में चले जाते हो।

जब अविद्या बहुत अधिक हो तो बुद्धि, मन और स्वयं के पृथक होने का भान ही नहीं रहता। मैं और मेरा मन अलग है यह जागरूकता ही नहीं रहती, हम इतना बाहर की बदलती हुई परिस्थितियों में उलझ जाते हैं।

जब तुम जागरूक होते हो तब तुम्हें पता होता है कि मन यह कह रहा है, बुद्धि यह है, मैं यह हूँ और बाहर यह हो रहा है, तुम अपने भीतर इन सबके अंतर को देख पाते हो। जो व्यक्ति जागरूक होता है वह ऐसी किसी भी अवस्था में कहेगा कि अरे, मेरे मन को हुआ क्या है? मैं पागल हो गया हूँ क्या? पर कोई व्यक्ति यदि सचमुच पागल हो गया हो तो वह ये सोचेगा भी नहीं कि वह पागल की तरह व्यवहार कर रहा है। उसके लिए मन, बुद्धि, चित्त, आत्म सब एक हो गया होता है।

इसी तरह कभी जैसे तुम्हें गुस्सा आता है और तुम उस गुस्से को बाहर दिखा नहीं रहे हो, तब तुम एक बार भीतर देखते भी हो तभी तुम्हें यह एहसास हो जाता है, अरे यह मेरे मन में इतना गुस्सा आ रहा है। इसी तरह यदि तुम्हें कभी बहुत काम वासना उठ जाए और तुम उस क्षण में जागरूक हो जाओ, अरे, मेरे मन में वासना उठ रही है।

परन्तु सामान्यतः लोग जो गुस्से में अपने आपा खो बैठते हैं, उन्हें यह जागरूकता ही नहीं होती की उन्हें गुस्सा आ रहा है, वह गुस्सा ही बन जाते हैं। क्या तुम यह समझ रहे हो?

शरीर को सँभालने के लिए भी शरीर में थोड़ा भय रखा ही गया है, पर यह खाने में नमक के बराबर, थोड़ा ही होना चाहिए। इससे भी कम, बहुत कम भय शरीर में उनके भी बना रहता है जो शास्त्रों और वेदों के ज्ञानी हैं। इसे भय नहीं, पर सतर्कता कहना अधिक ठीक है। भय का एकदम अलग ही अर्थ है। जागरूकता, सतर्कता और भय के गुणधर्म में एक समानता है। इसीलिए महृषि ने इसे भय न कहकर अभिनिवेश कहा है, अभिनिवेश के लिए कोई अन्य शब्द भी नहीं है। अभिनिवेश अपनी प्रगाढ अवस्था में भय और सूक्ष्मतम हो कर सतर्कता में प्रतिबिंबित होता है।

तुम किसी नदी पर एकदम किनारे चल रहे हो तब तुम सतर्कता पूर्वक चलते हो कि कहीं तुम फिसल न जाओ। यदि यह सतर्कता भी न रहे तब शरीर संभल ही नहीं पायेगा, तुम पानी में भी जा सकते हो। तुम शरीर नहीं हो पर इस वजह से शरीर का ध्यान नहीं रखने से तो शरीर रहेगा ही नहीं। शरीर को बनाये रखने के लिए कुछ मात्रा में उसका ध्यान रखना आवश्यक है।

जब यही सतर्कता कुछ अधिक हो जाती है तब असुरक्षा में परिणत होती है। थोड़ा और अधिक हो जाने पर यही असुरक्षा डर में और थोड़ा और अधिक होने पर पागलपन बन जाता है। यह ऐसे ही है जैसे कि खाने में नमक ज्यादा हो जाए तो वह खाने लायक नहीं रहता।

नमक के जैसे थोड़ी मात्रा में क्लेशों का अर्थ यह नहीं की तुम उन्हें सही साबित करने लगो। अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश, दुःख के इन पांच स्त्रोतों को साधना के माध्यम से क्षीण करते जाओ।

प्रतिपाद्य विषय है – मोक्ष । मोक्ष अर्थात् इस शरीर और उससे सम्बद्ध सुख-दुखों से मुक्ति । शरीर हमें प्राप्त होता है हमारी कुछ कमियों, कुछ अज्ञान के कारण । उनमें से कुछ अज्ञान क्लेश कहलाते हैं । “क्लेश” का अर्थ है दु:ख । योगदर्शन में दिए क्लेश स्वयं दु:ख तो नहीं हैं, परन्तु सब दु:खों के कारण हैं । पतञ्जलि मुनि ने बड़ी सूक्ष्मता से इनका विवरण किया है । फिर भी उसमें कुछ अनकही बातें हैं जिनको उभारने का मैंने इस लेख में प्रयत्न किया है ।

ऋषि ने क्लेशों को पांच में विभाजित किया है, परन्तु स्वयं बताया है कि, वास्तव में, ये सब एक क्लेश के ही विभिन्न आयाम हैं (“अविद्या क्षेत्रमुत्तरेषां०” योग०२।४) । यह एक क्लेश है –

१) अविद्या – सरल रूप में – “जैसे को तैसा न मानना” । विस्तार से, ऋषि कहते हैं –

अनित्याशुचिदु:खानात्मसु नित्यशुचिसुखात्मख्यातिरविद्या ॥ २।५ ॥

अर्थात् अनित्य में नित्य, अशुद्ध में शुद्ध, दु:ख में सुख और दूसरे में अपने को मानना अविद्या है । सूत्र में दिये हमारे भ्रमों में मुख्य है – दूसरी वस्तु में अपने को मानना । यहां ’दूसरी वस्तु’ से ऋषि का संकेत ’शरीर’ से है । शरीर अनित्य है, परन्तु हम उसे नित्य मानते हैं । शरीर मल से भरा होने के कारण अपवित्र होता है; हम स्नान, पूजा, आदि करके “पवित्र हो गया” – ऐसा मानने लगते हैं । शरीर के सुखों को हम सुख मानते हैं, जबकि वास्तव में वे दुःख ही होते हैं । शरीर में चैतन्य न होने पर भी हम उसे ही चेतन मानते हैं । इन सारे भ्रमों की जननी वस्तुतः एक है, जो कि अगले क्लेश में निरूपित है –

२) अस्मिता – अर्थात् जब हम देखने वाले और दिखाने वाली बुद्धि आदि को एक समझते हैं –

दृग्दर्शनशक्त्योरेकात्मतेवास्मिता ॥ २।६ ॥

यहां ’दर्शन-शक्ति’ से सभी इन्द्रियों का ग्रहण है । वस्तुतः, ज्ञानेन्द्रियों और कर्मेन्द्रियों को मिलाकर पूरा शरीर ही लक्षित है । सो, जो हम अपने चेतन स्वरूप और अचेतन शरीर में भेद नहीं कर पाते, यह इतना बड़ा भ्रम है कि अन्य सभी भ्रम इसी ’अविद्या’ पर आधारित होते हैं, जैसे –

३) राग – शरीर के सुखों से उत्पन्न उस वस्तु के प्रति जो हमारा प्रेम या इच्छा उत्पन्न हो जाती है, वह राग कहलाती है –

सुखानुशायी रागः ॥ २।७ ॥

जैसे – शरीर से उत्पन्न होने से, हमें हमारे बच्चे प्रिय होते हैं । वस्तुतः, हमारा उनसे कोई सम्बन्ध नहीं है – वे स्वतन्त्र आत्मा हैं, हम स्वतन्त्र । फिर भी, हम उन्हें जैसे अपना ही अंश मानते हैं । इसी प्रकार, हमें वे अनुभव पुनः दोहराने की इच्छा होती हैं, जो हमें सुखकारी लगे थे, जैसे – जलेबी खाना । सुख तो आत्मा को ही हुआ, लेकिन उसका कारण आत्मा नहीं था, शरीर था । जलेबी के सारे आंश शरीर को गये, हमें कुछ भी प्राप्त नहीं हुआ । फिर भी सुखी हम हुए – शरीर और अपने को एक मानने के कारण !

वास्तव में जो हमें तृप्ति देते हैं, वे हैं ज्ञान, और अपना व प्रभु का साथ । ये हमारे शरीर के लिए नहीं होते, हमारे लिये ही होते हैं । इनसे भी हमें लगाव हो सकता है, जैसे – वेद-पाठी को पढ़ने में ही इतना आनन्द आने लगता है कि वह उसे छोड़ना नहीं चाहता । वेदों ने इसको भी हेय कहा है –

 

अन्धन्तमः प्र विशन्ति येऽविद्यामुपासते ।

 

ततो भूय इव ते तमो य उ विद्यायां रतः ॥यजु०४०।१२ ॥

 

अर्थात् जो अविद्या = भौतिक विषयों के ज्ञान में लगे रहते हैं, वे अज्ञान के अन्धकार को प्राप्त करते हैं; परन्तु उससे भी गहरे अन्धकार को वो प्राप्त होते हैं, जो विद्या = शब्दार्थ-सम्बन्ध में ही रत रहते हैं, आचरण में कुछ भी नहीं लाते ।

दूसरी ओर, तपस्वी को परमात्मा का साथ इतना लुभावना लगने लगता है, कि वह समाधि से बाहर ही नहीं निकलना चाहता । उसके लिये शिष्यों को मार्ग दिखाना भी कष्टप्रद व्रत के समान होता है । इसीलिए, इस ज्ञान-प्रदान को संन्यास-आश्रम के कर्तव्यों और पञ्चमहायज्ञों में ब्रह्म-यज्ञ में गिनाया गया । अर्थात् समाधि में बैठे रहना और परोपकार न करना भी हेय है । फिर भी, ये लगाव अविद्या की कोटि में नहीं आते – केवल शरीर-जनित संस्कार ’राग’ कहाते हैं ।

४) द्वेष – राग के विपरीत, जो वस्तु हमारे शरीर को कष्ट देती है, उससे हम दूर रहना चाहते हैं ।

 

दु:खानुशायी द्वेष: ॥ २।८ ॥

 

जैसे – एक बार कांटे के चुभ जाने पर हम सभी नुकीले पदार्थों को डर-डर कर छूते हैं । यहां पर भी कष्ट तो शरीर को होता है, परन्तु दुःख का अनुभव हम करते हैं, और फिर हममें द्वेष-विकार उत्पन्न हो जाता है । हर प्रकार की ईर्ष्या, रोष, डर, किसी भी वस्तु से कतराना, द्वेष के प्रकार हैं । पुनः, जो अनिच्छा शरीर से सम्बद्ध न हो, उसे द्वेष नहीं कहते, जैसे – योगी की असत्य में अनिच्छा ।

५) अभिनिवेश – शरीर से आत्मीयता एक और भयंकर डर हमारे मन में उत्पन्न करती है – मृत्यु का भय । मनुष्य ही नहीं, हर प्राणी इस भय से परिचित है, इसको समीप से जानता है । माता को इसको बच्चे को सिखाना नहीं पड़ता, और बहुत ज्ञानी होने पर भी यह भय दूर नहीं होता –

 

स्वरसवाही विदुशोऽपि तथा रूढोऽभिनिवेश: ॥ २।९ ॥

 

ये डर जन्म लेते ही उत्पन्न हो जाता है, और मृत्यु पर ही साथ छोड़ता है । हां, यदि हमने मृत्यु से पहले अपने सच्चे रूप को देख लिया, तब यह डर छूट जाता है ।

इस प्रकार शरीर से आत्मीयता ही वास्तव में अन्य सभी अविद्याओं की जड़ है ।

आगे पतञ्जलि बताते हैं कि इन क्लेशों के कारण जो हम कर्म करते हैं, वे ही कर्म-फल के देने वाले बनकर, हमें इस जन्म और भावी जन्मों में झेलने पड़ते हैं ।

इस क्रम से छूटने का एक ही उपाय है – मोक्ष । उसके लिए, हमें क्लेशों को धीरे-धीरे कम करते जाना है । अष्टाङ्ग-योग इसका मार्ग है । परन्तु सामान्य साधकों के लिए उन्होंने कहा है कि वे उनमें से तीन अंशों को अवश्य अपनाएं – तप, स्वाध्याय और ईश्वर-प्रणिधान । इनको उन्होंने ’क्रिया-योग’ कहा । यह भगवद्-गीता में बताये क्रिया-योग से भिन्न है । अधिक कठिन न होते हुए भी, यह क्रिया-योग अत्यधिक शक्तिशाली है । विशेष रूप से, यदि हम अपने सारे कर्मों को प्रभु को समर्पित कर देते हैं (ईश्वर-प्रणिधान), तो उससे हमारी अनेकों अशुद्धियां अपने-आप ही समाप्त हो जाती हैं

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