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धार्मिक

(भाग:184) मनुष्य को अध:पतन की ओर ले जाने वाले बुरे कर्मों की विस्तारपूर्वक व्याख्या की थी भगवान बुद्ध ने

भाग:184) मनुष्य को अध:पतन की ओर ले जाने वाले बुरे कर्मों की विस्तारपूर्वक व्याख्या की थी भगवान बुद्ध ने टेकचंद्र सनोडिया शास्त्री: सह-संपादक रिपोर्ट बौधगया। धर्म कीर्ति आज से लगभग ढाई हजार वर्ष पूर्व भगवान बुद्ध ने बुरे कर्मों की विस्तारपूर्वक व्याख्या की थी। एक समय बुद्ध श्रावस्ती में सेठ अनाथ पिंडिक द्वारा निर्मित जेतवनाराम मठ में वर्षावास कर रहे …

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(भाग:183) गीता में कर्म के फल का महत्व ? मनुष्य को कर्मो का फल भोगना ही पड़ता है और कैसे मिलता है कर्म फल|

भाग:183) गीता में कर्म के फल का महत्व ? मनुष्य को कर्मो का फल भोगना ही पड़ता है और कैसे मिलता है कर्म फल| टेकचंद्र सनोडिया शास्त्री: सह-संपादक रिपोर्ट मनुष्य को कर्मो का फल भुगतना ही पडता है। आज इस लेख में हम कर्मों का फल अवश्य ही भुगतना पड़ता है, क्योंकि इंसान ही अच्छे और बुरे कर्म करता है, …

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(भाग:182) सांसारिक विषय वासनाओं का त्याग से होगी ईश्वर की प्राप्ति?श्री कृष्ण ने गीता में अर्जुन को दिखाया था मार्ग।

भाग:182) सांसारिक विषय वासनाओं का त्याग से होगी ईश्वर की प्राप्ति?श्री कृष्ण ने गीता में अर्जुन को दिखाया था मार्ग। टेकचंद्र सनोडिया शास्त्री: सह-संपादक रिपोर्ट आप मन को सभी तरह के भय से हटाकर भगवान श्री कृष्ण की भक्ति में लगाएं और चिंतन करें, जिससे मन में एकाग्रता आएगी। आप कृष्णमय हो जायेंगे व भगवान की कृपा होगी। ईश्वर को …

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(भाग:181) गीता के अनुसार नैतिक मूल्यों में गिरावट की वजह है संस्कार हीनता और अधपतन

भाग:181) गीता के अनुसार नैतिक मूल्यों में गिरावट की वजह है संस्कार हीनता और अधपतन टेकचंद्र सनोडिया शास्त्री: सह-संपादक रिपोर्ट गीता मनुष्य को जीने की कला सिखाती है। यह मनुष्य को दुःख-सुख, हानि-लाभ, हार-जीत आदि में सन्तुलित रहकर कर्म करने का महान् सन्देश देती है। इसलिए गीता के उपदेश को ”नैतिक मूल्यों व दर्शन” में मानवीय जीवन की कठिनाईयों के …

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(भाग:180) चराचर जगत निर्माता ईश्वर का ध्यान में तल्लीन रहने वाला भक्त भगवान को अतिशय प्रिय है

(भाग:180) चराचर जगत निर्माता ईश्वर का ध्यान में तल्लीन रहने वाला भक्त भगवान को अतिशय प्रिय है टेकचंद्र सनोडिया शास्त्री: सह-संपादक रिपोर्ट (अर्जुन उवाच) एवम्, सततयुक्ताः, ये, भक्ताः, त्वाम्, पर्युपासते, ये, च, अपि, अक्षरम्, अव्यक्तम्, तेषाम्, के, योगवित्तमाः।।1।। अनुवाद: (ये) जो (भक्ताः) भक्तजन (एवम्) पूर्र्वोंक्त प्रकारसे (सततयुक्ताः) निरंन्तर आपके भजन-ध्यानमें लगे रहकर (त्वाम्) आप (च) और (ये) दूसरे जो केवल …

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(भाग:179) श्रीमद्-भगवत गीता के अनुसार चराचर जगत के कणं कणं मे व्याप्त है सर्व व्यापक परमात्मा

भाग:179) श्रीमद्-भगवत गीता के अनुसार चराचर जगत के कणं कणं मे व्याप्त है सर्व व्यापक परमात्मा टेकचंद्र सनोडिया शास्त्री:सह-संपादक रिपोर्ट (अर्जुन द्वारा विश्वरूप के दर्शन के लिये प्रार्थना) अर्जुन उवाच मदनुग्रहाय परमं गुह्यमध्यात्मसञ्ज्ञितम्‌ । यत्त्वयोक्तं वचस्तेन मोहोऽयं विगतो मम ॥ (१) भावार्थ : अर्जुन ने कहा – मुझ पर कृपा करने के लिए आपने जो परम-गोपनीय अध्यात्मिक विषयक ज्ञान दिया …

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(भाग:178) श्रीमद्-भगवत गीता के अनुसार जिनके मन में अहंकार ईर्ष्या व द्वेष है उनका पतन निश्चित रुप से तय है

भाग:178) श्रीमद्-भगवत गीता के अनुसार जिनके मन में अहंकार ईर्ष्या व द्वेष है उनका पतन निश्चित रुप से तय है टेकचंद्र सनोडिया शास्त्री: सह-संपादक रिपोर्ट श्रीमद्भागवत गीता के अनुसार प्रेम भक्ति किसी को पाना नहीं बल्कि उसमें खो जाना है! प्रेम भक्ति वही है, जिसमें त्याग हो और स्वार्थ की भावना नहीं हो।” श्री भगवद्गीता में भौतिक, सांसारिक, स्वार्थपूर्ण प्रेम …

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(भाग:177) श्री मद्-भगवतगीता ब्रम्ह विधा- ज्ञान विधा और साधना विधा से परिपूर्ण है।

भाग:177) श्री मद्-भगवतगीता ब्रम्ह विधा- ज्ञान विधा और साधना विधा से परिपूर्ण है। टेकचंद्र सनोडिया शास्त्री: सह-संपादक रिपोर्ट हिंदू धर्म के सबसे पवित्र ग्रंथों में से एक श्री मद्-भगवदगीता है। श्रीमद्भगवद्गीता का उपदेश भगवान श्रीकृष्ण ने महाभारत का युद्ध शुरू होने से पहले अर्जुन को दिया था। श्रीमद्भगवद्गीता को महाभारत के भीष्म पर्व के समग्र उपनिषद के रूप में दिया …

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(भाग:176) संसार की समस्त बुराईयों का त्याग से ही मिल सकती है मन की शांति और स्थाई समाधान?

भाग:178) संसार की समस्त बुराईयों का त्याग से ही मिल सकती है मन की शांति और स्थाई समाधान? टेकचंद्र सनोडिया शास्त्री: सह-संपादक रिपोर्ट महाभारत युद्ध से पहले श्रीकृष्ण ने अर्जुन को गीता का उपदेश दिया था, जिसमे समस्त बुराईयों का त्याग करके सिर्फ अपने कर्म करने की प्रधानता पर जोर दिया था। समस्त मानव जाति हर वर्ष भाद्रपद मास के …

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(भाग:174) शिक्षित और प्रशिक्षित मन हमारा मित्र तथा अशिक्षित और अप्रशिक्षित मन हमारा शत्रु ही है!

भाग:174) शिक्षित और प्रशिक्षित मन हमारा मित्र तथा अशिक्षित और अप्रशिक्षित मन हमारा शत्रु ही है टेकचंद्र सनोडिया शास्त्री: सह-संपादक रिपोर्ट श्रीकृष्ण कर्मयोग और कर्म संन्यास के तुलनात्मक मूल्यांकन के अनुक्रम को पांचवें अध्याय से इस छठे अध्याय में भी जारी रखते हैं और पहले वाले मार्ग के अनुसरण की संस्तुति करते हैं। जब हम समर्पण के साथ कार्य करते …

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