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धार्मिक

(भाग:179) श्रीमद्-भगवत गीता के अनुसार चराचर जगत के कणं कणं मे व्याप्त है सर्व व्यापक परमात्मा

भाग:179) श्रीमद्-भगवत गीता के अनुसार चराचर जगत के कणं कणं मे व्याप्त है सर्व व्यापक परमात्मा टेकचंद्र सनोडिया शास्त्री:सह-संपादक रिपोर्ट (अर्जुन द्वारा विश्वरूप के दर्शन के लिये प्रार्थना) अर्जुन उवाच मदनुग्रहाय परमं गुह्यमध्यात्मसञ्ज्ञितम्‌ । यत्त्वयोक्तं वचस्तेन मोहोऽयं विगतो मम ॥ (१) भावार्थ : अर्जुन ने कहा – मुझ पर कृपा करने के लिए आपने जो परम-गोपनीय अध्यात्मिक विषयक ज्ञान दिया …

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(भाग:178) श्रीमद्-भगवत गीता के अनुसार जिनके मन में अहंकार ईर्ष्या व द्वेष है उनका पतन निश्चित रुप से तय है

भाग:178) श्रीमद्-भगवत गीता के अनुसार जिनके मन में अहंकार ईर्ष्या व द्वेष है उनका पतन निश्चित रुप से तय है टेकचंद्र सनोडिया शास्त्री: सह-संपादक रिपोर्ट श्रीमद्भागवत गीता के अनुसार प्रेम भक्ति किसी को पाना नहीं बल्कि उसमें खो जाना है! प्रेम भक्ति वही है, जिसमें त्याग हो और स्वार्थ की भावना नहीं हो।” श्री भगवद्गीता में भौतिक, सांसारिक, स्वार्थपूर्ण प्रेम …

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(भाग:177) श्री मद्-भगवतगीता ब्रम्ह विधा- ज्ञान विधा और साधना विधा से परिपूर्ण है।

भाग:177) श्री मद्-भगवतगीता ब्रम्ह विधा- ज्ञान विधा और साधना विधा से परिपूर्ण है। टेकचंद्र सनोडिया शास्त्री: सह-संपादक रिपोर्ट हिंदू धर्म के सबसे पवित्र ग्रंथों में से एक श्री मद्-भगवदगीता है। श्रीमद्भगवद्गीता का उपदेश भगवान श्रीकृष्ण ने महाभारत का युद्ध शुरू होने से पहले अर्जुन को दिया था। श्रीमद्भगवद्गीता को महाभारत के भीष्म पर्व के समग्र उपनिषद के रूप में दिया …

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(भाग:176) संसार की समस्त बुराईयों का त्याग से ही मिल सकती है मन की शांति और स्थाई समाधान?

भाग:178) संसार की समस्त बुराईयों का त्याग से ही मिल सकती है मन की शांति और स्थाई समाधान? टेकचंद्र सनोडिया शास्त्री: सह-संपादक रिपोर्ट महाभारत युद्ध से पहले श्रीकृष्ण ने अर्जुन को गीता का उपदेश दिया था, जिसमे समस्त बुराईयों का त्याग करके सिर्फ अपने कर्म करने की प्रधानता पर जोर दिया था। समस्त मानव जाति हर वर्ष भाद्रपद मास के …

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(भाग:174) शिक्षित और प्रशिक्षित मन हमारा मित्र तथा अशिक्षित और अप्रशिक्षित मन हमारा शत्रु ही है!

भाग:174) शिक्षित और प्रशिक्षित मन हमारा मित्र तथा अशिक्षित और अप्रशिक्षित मन हमारा शत्रु ही है टेकचंद्र सनोडिया शास्त्री: सह-संपादक रिपोर्ट श्रीकृष्ण कर्मयोग और कर्म संन्यास के तुलनात्मक मूल्यांकन के अनुक्रम को पांचवें अध्याय से इस छठे अध्याय में भी जारी रखते हैं और पहले वाले मार्ग के अनुसरण की संस्तुति करते हैं। जब हम समर्पण के साथ कार्य करते …

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मनसेतर्फे रामटेक शहरातील रथयात्रा व शोभायात्रेनिमित्त भोजनदान कार्यक्रम

  प्रभु श्री रामाच्या चरणस्पर्शाने पावन झालेल्या रामटेक शहरात दरवर्षी होणाऱ्या रथयात्रा व शोभायात्रे निमित्त तसेच तालुक्यात होणाऱ्या मंडई कार्यक्रमाच्या उपलक्षाने रामटेक तालुका व बाहेरील असंख्य नागरिक शहरात येत असल्याचे चित्र शहरात अनुभवल्या जाते याच निमित्ताने महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना पक्षाचे रामटेक विधासभा क्षेत्रातील जिल्ह्याध्यक्ष श्री. शेखर दुंडे व असंख्य पदाधिकार्यांच्या मदतिने दि. २५ नोव्हेंबर रोज शनिवारला शहरातील शनिवारी वार्ड परिसरातील …

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(भाग:171) जिनका अंत:करण ज्ञान विज्ञान अर्थात तत्वज्ञान से तृप्त है उसीका जीवन धन्य!

भाग:171) जिनका अंत:करण ज्ञान विज्ञान अर्थात तत्वज्ञान से तृप्त है उसीका जीवन धन्य है। टेकचंद्र सनोडिया शास्त्री: सह-संपादक रिपोर्ट अनाश्रितः, कर्मफलम्, कार्यम्, कर्म, करोति, यः, सः, सन्यासी, च, योगी, च, न, निरग्निः, न, च, अक्रियः।।1।। अनुवाद: (यः) जो साधक (कर्मफलम्) कर्मफलका (अनाश्रितः) आश्रय न लेकर (कार्यम्) शास्त्र विधि अनुसार करनेयोग्य (कर्म) भक्ति कर्म (करोति) करता है (सः) वह (सन्यासी) सन्यासी …

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(भाग :170)गीता में श्रीकृष्ण कहते है जो मेरी शरण में आता है उसका कभी विनाश नहीं होता है।

भाग :170)गीता में श्रीकृष्ण कहते है जो मेरी शरण में आता है उसका कभी विनाश नहीं होता है। टेकचंद्र सनोडिया शास्त्री: सह-संपादक रिपोर्ट अवधूूत गीता मं निम्नलिखित पंक्ति का अर्थ है कि अकर्म से विकर्म की प्राप्ति। जिसका अर्थ है भगवान के दिए ज्ञान को प्राप्त करके कर्म करना और उन कर्मों से कुछ ऐसा कर जाना जिससे विशेष कर्म …

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(भाग:168) अधर्म का विनाश और धर्म की स्थापना करने के लिये मैं युग-युग में प्रकट हुआ करता हूँ

भाग:168) अधर्म का विनाश और धर्म की स्थापना करने के लिये मैं युग-युग में प्रकट हुआ करता हूँ ।। ८ टेकचंद्र सनोडिया शास्त्री: सह-संपादक रिपोर्ट श्रीकृष्ण कहते है हे अर्जुन ! मेरे जन्म और कर्म दिव्य अर्थात् निर्मल और अलौकिक हैं —- इस प्रकार जो मनुष्य तत्त्व से जान लेता है, वह शरीर को त्याग कर फिर जन्म को प्राप्त …

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(भाग:167) पूर्ण ज्ञान के अभाव में अज्ञान अंधकार में डूबे अल्प ज्ञानी लोग व्यथित भ्रम मे भटकते रह जाते है

भाग:167) पूर्ण ज्ञान के अभाव में अज्ञान अंधकार में डूबे अल्प ज्ञानी लोग व्यथित भ्रम मे भटकते रह जाते है टेकचंद्र सनोडिया शास्त्री: सह-संपादक रिपोर्ट इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम्‌ । विवस्वान्मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत्‌ ॥ (१) भावार्थ : श्री भगवान ने कहा – मैंने इस अविनाशी योग-विधा का उपदेश सृष्टि के आरम्भ में विवस्वान (सूर्य देव) को दिया था, विवस्वान ने …

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